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Kartam Bhugtam Review: अतीत से निकली कहानी पर सोहम ने खींची काल की कसौटी, इस बार श्रेयस के लक का इम्तिहान

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कर्तम भुगतम् - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
कर्तम भुगतम्
कलाकार
श्रेयस तलपदे , विजय राज , मधु , अक्षा परदसानी और आदि
लेखक
सोहम पी शाह
निर्देशक
सोहम पी शाह
निर्माता
गंधार फिल्म्स एंड स्टूडियो
रिलीज
17 मई 2024
रेटिंग
2/5

‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के क्लाइमेक्स में जब सर्किट बने अरशद वारसी ज्योतिषी बने सौरभ शुक्ला की कनपटी पर तमंचा सटाता है और उनसे उनके भविष्य के बारे में सवाल करता है, तो जहन में सबसे पहले बात यही आती है कि ज्योतिष में भविष्य बता पाने का कितना दम है। आज के दौर के मशहूर सेलेब्रिटी एस्ट्रॉलॉजर संदीप कोचर को जब मैंने जी न्यूज के डेली शो ‘बचके रहना’ में लॉन्च किया था, तो मेरा सवाल भी उनसे यही था। जवाब एक ही है कि ज्योतिष आपका भाग्य नहीं बदल सकता और न ही जो विधि ने लिखा है, उसे बदल सकता है। ज्योतिष सिर्फ सही समय पर सही दिशा में सही प्रयास करने के लिए किसी व्यक्ति को तैयार रख सकता है और उन गलतियों को लेकर सजग रहने की सलाह दे सकता है, जो ग्रह दशा ठीक न होने पर इंसान कर बैठता है। ‘काल’ और ‘लक’ के बाद समय की चाल समझने की कोशिश निर्देशक सोहम पी शाह ने अपनी नई फिल्म ‘कर्तम भुगतम्’ में भी की है।

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कर्तम भुगतम् - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
सोहम पी शाह के ज्योतिषीय सलाहकार कौन हैं, और वह उन्हें क्या सलाह देते है, ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन मुंबई की गगनचुंबी इमारत अडाणी हाइट्स के आलीशान फ्लैट में रहने वाले संदीप कोचर के पास ज्योतिषीय गणना के तमाम अचरज भरे किस्से हैं। दीपिका पादुकोण की मां को वह बिल्कुल सटीक भविष्यवाणी उनकी बिटिया के बारे में कर चुके हैं। माधुरी दीक्षित के वह लंबे समय तक सलाहकार रहे। भारतीय क्रिकेट टीम के कोच जब ग्रेग चैपल हुआ करते थे, तब वह ज्योतिष को क्रिकेट मैदान तक ले आए थे। और, राहुल गांधी को लेकर जो उनकी ज्योतिषीय गणना है, वह अगर सच हुई तो फिर तो कहने ही क्या? फिल्म ‘कर्तम भुगतम’ की कहानी भी ऐसी है। कर्म से कमाई जिंदगी में विधि के विधान से मिली संपत्ति का गुणा भाग।

कर्तम भुगतम् - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
सोहम पी शाह अपनी कहानियों में अचरज भरी घटनाएं छुपाकर रखने वाले फिल्मकार हैं। अगर आपने उनकी पिछली दोनों फिल्में ‘काल’ और ‘लक’ देखी हैं, तो आपको उनकी पटकथा की तुरपाई खोलने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। ‘व्हाट्स योर राशि’ ‘सावन’ और ‘मिलेंगे मिलेंगे’ से लेकर हाल ही में आई हॉलीवुड फिल्म ‘टैरो’ तक ज्योतिष के कई रंग दर्शक देश सुन चुके हैं, लेकिन सच ये भी है कि ज्योतिष मनोरंजन का साधन नहीं बन सकता। इसकी गणनाओं के सहारे अपनी विरासत का टंटा सुलझाते सुलझाते विदेश से आए एक युवक के ग्रहों की चाल में अटक जाने की कहानी कहती है, ‘कर्तम भुगतम्’। वो हिट गाना तो आपको याद ही होगा, ‘सुख दुख है क्या फल कर्मों का, जैसी करनी वैसी भरनी...!’ बस इस फिल्म के तार भी वहीं से जुड़े हैं।

कर्तम भुगतम् - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
फिल्म ‘कर्तम भुगतम’ की सबसे कमजोर कड़ी इसकी कमजोर कहानी ही है। सोहम पी शाह अपने अनुभवों के सहारे इसमें घटनाएं पिरोते चलते हैं। और, शुरू शुरू में ये बहुत सुस्त चाल ही चलती है। इंटरवल आने पर लगता है कि शायद अब मामला संभल जाए। लेकिन, दर्शकों को बार बार चौंकाने के चक्कर में इसके बाद की कहानी भी किसी भी घाट तक पहुंच ही नहीं पाती। एक औसत से भी कमतर फिल्म को उन्होंने हिंदी के अलावा तमाम दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी रिलीज करने की कोशिश की है, लेकिन फिल्म की बुनावट और भूगोल ऐसा है कि विजय राज का एक ज्योतिषी के रोल में होना ही सबसे ज्यादा खटकने लगता है।

कर्तम भुगतम् - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
श्रेयस तलपदे की वजह से ही ये फिल्म देखने अधिकतर दर्शक सिनेमाघरों तक पहुंचे दिखे। उनको अकस्मात आए हृदयाघात के बाद से लोगों की उनके प्रति सहानुभूति बढ़ी है। 20 साल से भी ज्यादा समय से वह कैमरे के सामने हैं और ‘इकबाल’ से लेकर ‘कौन प्रवीण तांबे?’ तक अपने अभिनय के सुर उन्होंने कभी बिगड़ने नहीं दिए। यहां भी वह फिल्म के सुर के साथ अपना राग मिलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन श्रेयस की मासूमियत उन्हें एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर के साथ साम्य बनाने में बहुत अड़चनें लाती है। श्रेयस की जोड़ीदार अक्षता परदसानी के साथ दिक्कत और ज्यादा है, वह अभी हौले हौले अभिनय की सीढ़ियां चढ़ ही रही हैं और श्रेयस के साथ उनका एक फ्रेम में आना संतुलन के विपरीत नजर आता है। विजय राज की अपनी अलग ही देहभाषा है और उनके तेवर हर किरदार में एक जैसे ही सधे नजर आते हैं। मधु का अभिनय गौर करने लायक है, वह अब एकदम सधी हुई दिखती हैं। मां के किरदार में बिल्कुल फिट।
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कर्तम भुगतम् - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
फिल्म ‘कर्तम भुगतम’ उतनी फिट फिल्म नहीं है। संतोष थुंडियल जैसे दिग्गज कैमरामैन का साथ पाकर भी सोहम पी शाह कुछ ऐसा नहीं रच पाए हैं जिसे दर्शक फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रखे। कुछ लो एंगल शॉट्स और कुछ खूबसूरत नजारे दर्शकों का ध्यान तो परदे पर केंद्रित रखते हैं लेकिन फिल्म के जंप स्केयर्स इसका आनंद भी नहीं लेने देते। फिल्म का संगीत भी इसकी कमजोर कड़ियों में शामिल है। स्टॉक म्यूजिक सा लगता इसका बैकग्राउंड म्यूजिक और अरसे से तैयार पड़े गानों सा एहसास देता इसका गीत संगीत फिल्म की बिल्कुल मदद नहीं करता है।
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