Jayeshbhai Jordaar Review
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
बदलते दौर में पिछड़ती फिल्म
रणवीर सिंह अपनी पिछली फिल्म ‘83’ तक हिट की हैट्रिक पर सवार रहे। फिर कोरोना आया और लोगों के फिल्म देखने का नजरिया पूरी तरह बदल गया। कोई यकीन कर सकता है कि ‘83’ जैसी फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो सकती है भला! लेकिन, इसका संकेत इसके मेकर्स को पहले ही भांप लेना चाहिए था। विश्वस्तर पर लोगों की बायोपिक फिल्मों में दिलचस्पी बीते पांच साल से लगातार कम होती जा रही है। सोशल ड्रामा भी अब लोगों को पसंद नहीं आता। हां, फिल्म एक्शन हो, थ्रिलर हो या सोशल कॉमेडी हो तो उसकी कामयाबी की प्रायिकताएं (प्रोबैबिलिटी) बढ़ जाती हैं। फिल्म ‘जयेशभाई जोरदार’ के साथ दिक्कत ये है कि जो कुछ इसे बनाने वाले फिल्म के ट्रेलर में दिखा चुके हैं, उससे ज्यादा कुछ फिल्म में दिखाने को है नहीं। ‘जयेशभाई जोरदार’ का ट्रेलर रणवीर सिंह के करियर की बेस्ट कमर्शियल फिल्म है। वह कहते भी हैं कि उनकी प्राथमिकताएं जीवन में विज्ञापन फिल्में रही हैं।
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गुजरात की पृष्ठभूमि कमजोर कड़ी
फिल्म ‘जयेशभाई जोरदार’ की कहानी बताना या लिखना जितना बोरिंग लग रहा है उतनी ही सुस्त ये फिल्म बन गई है। अपने बेटे के बेटे को अपना वारिस बनाने की सोच रखने वाला कोई शख्स गुजरात में है। परिवार उसका इस राज्य में जन्म पूर्व लिंग परीक्षण होने की बात भी करता है। गुजरात पर्यटन ने अपने प्रदेश की छवि सुधारने में जो सैकड़ों करोड़ रुपये अब तक दुनिया में खर्च किए हैं, फिल्म ‘जयेशभाई जोरदार’ के निर्देशक दिव्यांग ठक्कर ने उनमें अपनी बस इस फिल्म से पलीता लगा दिया है। इतनी प्रतिगामी (रिग्रेसिव) सोच वाली कहानियों पर बने तो अब सीरियल भी नहीं चलते, फिल्म कैसे चलेगी? ये छोटा मोटा नहीं सौ करोड़ का सवाल है, जिसका जवाब देने की कोशिश जयेश अपनी अजन्मी बेटी को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाकर करता इस फिल्म में दिखता है।
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फिल्म देखने की इकलौती वजह बने रणवीर
कोई 50 से 60 करोड़ रुपये में बनकर रिलीज हुई फिल्म ‘जयेशभाई जोरदार’ को देखने का एक ही उत्साह है और वह हैं इसके अभिनेता रणवीर सिंह। 12 साल पहले मनीष शर्मा ने उनको बतौर हीरो लॉन्च करने की जिम्मेदारी निर्देशक के तौर पर संभाली थी, फिल्म ‘बैंड बाजा बारात’ के वही मनीष शर्मा अब फिल्म ‘जयेशभाई जोरदार’ के निर्माता हैं। रणवीर ने मनीष के लिए अपने करियर का एक और बेहतरीन अभिनय किया है। देखा जाए तो पूरी फिल्म रणवीर ने अपन कंधों पर उठाने की कोशिश की है, लेकिन उनके साथी कलाकार फिल्म से उतना जुड़े नजर नहीं आते फिल्म में। शालिनी पांडे तक अपने अभिनय में अनिच्छा सी प्रकट करती नजर आती हैं। बोमन ईरानी से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद इस तरह के किरदारों में की जाती है। हिंदी सिनेमा को सहायक कलाकारों के मामले में रत्ना पाठक और बोमन से आगे अब निकलना ही होगा।
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यश राज फिल्म्स की बेहद कमजोर कहानी
फिल्म ‘जयेशभाई जोरदार’ की सबसे कमजोर कड़ी है इसकी पटकथा जिसे सुनकर रणवीर सिंह खुद बताते हैं कि वह उछल पड़े थे। निर्माता मनीष शर्मा का भी दावा है कि इसे पढ़कर उन्होंने चार दिन के भीतर ही दिव्यांग को इस फिल्म के निर्देशन का जिम्मा सौंप दिया था। अगर यश राज फिल्म्स की क्रिएटिव टीम फिल्मों का चयन ऐसे कर रही है तो फिर इस टीम को बदलने की और विश्व सिनेमा पर नजर रखने वाले नए युवाओं को इस टीम में लाने की सख्त जरूरत है। फिल्म ‘जयेशभाई जोरदार’ एक ओटीटी फिल्म भी बहुत मुश्किल से दिखती है। पटकथा के अलावा इसका निर्दशन और इसका संगीत भी कमजोर है। निर्देशक की पकड़ फिल्म से पहले 30 मिनट के बाद ही छूट जाती है। इसके बाद ये फिल्म सिर्फ और सिर्फ रणवीर सिंह के चलते दर्शकों को आखिर तक अटकाकर रख पाती है।
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देखें कि ना देखें
अगर आपने अरसे से कोई सामाजिक फिल्म सिनेमाघरों में अपने परिवार के साथ नहीं देखी है तो ये फिल्म आपके लिए टाइमपास का बहाना हो सकती है। अकेले फिल्म देखने के शौकीन लोगों को फिल्म बोरिंग लग सकती है। हां, गुजरात को नए नजरिये से देखना हो तो इसे जरूर देखें।