'एबीसीडी' भारत की पहली थ्रीडी डांस फिल्म कही जा रही है। कोई भी फिल्म वह चाहे एक्शन फिल्म हो, कॉमेडी फिल्म हो, रोमांटिक फिल्म हो या फिर डांस फिल्म, उस फिल्म में 'फिल्म' होनी चाहिए। 'एबीसीडी' के साथ समस्या यही है कि इस फिल्म में डांस तो है पर 'फिल्म' नहीं। कई बार तो हमें लगता है कि हम 'डांस इंडिया डांस' जैसे किसी डांस रियलिटी शो का कोई ऐपीसोड देख रहे हैं जिसमें विज्ञापनों की जगह बीच-बीच फिल्म आ जाती है।
फिल्म में फिल्म न होने को कुछ इस तरह से समझिए। फिल्म के एक दृश्य में जब अपनी चिकन मटन की दुकान को छोड़कर डांस सीख रहे एक लड़के को उसके पिता डांस क्लासेज से घसीटकर ले जा रहे होते हैं तो वह इसके विरोध में कुछ कहता नहीं बल्कि डांस करने लगता है। उसी बीच बारिश होने लगती है और लड़का भीग-भीग कर डांस के स्टेप कर रहा होता है। बिल्कुल सपाट चेहरे के साथ। इसी डांस ग्रुप में जब एक डांसर सड़क दुर्घटना में मारा जाता है तो उसकी प्रेमिका कुछ कहने के बजाय रोते-रोते डांस करनी लगती है। यदि यह बातें डांस के फेवर में जाती हैं तो फिल्म के खिलाफ। पूरी फिल्म में सिर्फ केके मेनन हैं जिनके अभिनय को देखकर यह लगता रहता है कि वह फिल्म देख रहे हैं।
केके मेनन को छोड़कर फिल्म के सभी पात्र डांस तो अच्छा करते हैं पर वह अभिनय बिल्कुल भी नहीं कर पा रहे होते हैं। हां यह तय हैं कि यदि आप डांस के शौकीन हैं और स्कूल-कॉलेज या किसी क्लब कि डांस प्रतियोगिताओं से जुड़े रहे हैं तो फिर आपको यह फिल्म अच्छी लग सकती है। फिल्म में कई तरह का डांस है। गणपति देवा से लेकर हॉलीवुड स्टाईल तक। फिल्म बनाने वालों को इस बात के लिए कॉम्पीलीमेंट मिलना चाहिए कि उन्होंने डांस को एक फिल्म के रूप में चुना।
कहानी
विष्णु सर (प्रभु देवा) एक डांस अकेडमी में डांस सिखाता है। उस डांस अकेडमी का मालिक जहांगीर खान (केके मेनन) है। जहांगीर खां, विष्णु सर को निकालकर उनकी जगह एक अमेरिकन डांस टीचर रख लेता है। निराश विष्णु अपने घर चेन्नई लौट जाना चाहता है पर उसका दोस्त गोपी (गणेश आचार्य) उसे रोक लेता है। गणेश विसर्जन के एक कार्यक्रम में विष्णु की नजर उस मोहल्ले के ऐसे कुछ डांसरों पर पड़ती है जिनके पास डांस का हुनर तो है पर उन्हें डांस का सही गाइडेंस नहीं मिल पा रहा है।
विष्णु मुंबई में रुककर ही उन्हें डांस सिखाने के लिए एक अकादमी शुरू करता है। अकादमी शुरू करने और उसे चलाए रखने में भी कुछ समस्याएं आती हैं। बाद में यह डांस ग्रुप डांस के उस कंपटीशन में भागीदारी करता है जहां जहांगीर खान की डांस अकेडमी कई साल से विनर रहती है। फिल्म का क्लाइमेक्स इसी बात में है कि विष्णु का बनाया यह डांस ग्रुप किस तरह से उस प्रतियोगिता का विजेता बनता है। खत्म होती हुई फिल्म इस बात का इशारा दे जाती है कि जहांगीर खान को अपनी गलती का एहसास हो गया है।
अभिनय
केके मेनन को छोड़कर इस पूरी फिल्म का हर पात्र डांस से तो किसी न किसी रूप से जुड़ा रहा, पर उनका ऐक्टिंग से कभी कोई वास्ता नहीं रहा है। नए कलाकरों की तो यह पहली फिल्म रही। इस लिहाज से उन्होंने स्वाभाविक रूप से कमजोर अभिनय किया। किसी के चेहरे में भाव नहीं दिखे हैं। वह डॉयलॉग भी चीख-चीख कर ही बोलते हैं। एक गंभीर डांस टीचर की भूमिका के लिए प्रभु देवा ने मेहनत तो बहुत की है। चूंकि प्रभु का वास्ता अभिनय की बारीकियों से नहीं रहा है इसलिए उनका गंभीर किरदार कई जगह डल नजर आता है।
हिंदी बोलने की समस्या की वजह से उन्हें एक या दो वाक्यों के ही संवाद दिए गए हैं। अपनी कई कमियों के बावजूद प्रभु देवा निराश नहीं करते। एक प्रैक्टिकल और महात्वाकांक्षी डांस अकादमी संचालक के रूप में केके मेनन ने खूबसूत अभिनय किया है। उनके संवाद और बॉडी लैंग्वेज दोनों अच्छी है। एक और कोरियाग्राफर गणेश आचार्य की साऊथ पैटर्न की कॉमेडी और इमोशन पैदा करने की कोशिश कुछ दर्शकों को भली भी लग सकती है।
निर्देशन
रीमो डीसूजा एक अच्छे कोरियाग्राफर हैं मगर फिल्म बनाने की समझ उन्हें नहीं है। उन्हें डांस की समझ है और उन्होंने अपनी इस फिल्म में उसे बखूबी दर्शाया भी। हर उस जगह जहां अभिनय की जरूरत होती है रीमो ने उसे डांस से कवर करने की कोशिश की है। चूंकि रीमो को खुद भी अभिनय का इल्म नहीं है इसलिए वह कलाकारों से भी अभिनय नहीं करवा पाए हैं।
कई दृश्यों को देखकर लगता है कि इस फिल्म को बनाने से पहले रीमो ने हिंदी की कुछ अच्छी फिल्में भी नहीं देखीं। कुछ दृश्य बड़े बचकाने और अतार्किक दिखते हैं। चूंकि सब कलाकार ओवरऐक्टिंग कर रहे होते हैँ इसलिए यह फिल्म बहुत लाऊड होती जाती है। फिल्म को थ्रीडी में बनाने का फायदा यह होता है कि दर्शकों को लगता है कि डांस में वह भी उनके साथ हैं।
संगीत
पूरी फिल्म ही डांस और म्यूजिक के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में कम से कम बीस जगहों पर डांस किया गया है। इसमें से आठ से दस जगहों पर गाने के साथ और बाकी म्यूजिक के साथ। जो डांस गानों के साथ हैं उनमें 'बच्चे की लोगो जान क्या' और 'बेजुबां' अच्छे बन पड़े हैं। 'चंदू की गर्लफ्रेंड' एक रोमांटिक गाना है। यह भी देखने में अच्छा लगता है। बाकी सब गाने तेज डांस और लाऊड म्यूजिक के बीच दब कर रह जाते हैं, जो फिल्म के साथ तो अच्छे लग सकते हैं पर अलग से नहीं।
क्यों देखें
यदि आप डांस के शौकीन हों। नए-नए किस्म का डांस पसंद करते हों और एक डांस ग्रुप की कहानी को देखना चाहते हों।
क्यों न देखें
यदि आप इस फिल्म से फिल्म जैसा कुछ उम्मीद कर रहे हों। जहां डांस के साथ फिल्म भी हो।