अभिनय
यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। फिल्म में मुख्य रोल निभाया है अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा ने। उन्होंने अपने लुक्स से लेकर अभिनय तक भरपूर मेहनत की है। फिल्म देखकर आपको उनसे प्यार हो जाएगा। अरुण के साथ अक्षय कुमार की भतीजी सिमर भाटिया ने डेब्यू किया है। उनके पास जितना रोल है उसमें उनका काम भी प्रॉमिसिंग है।
धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत पूरी फिल्म में आपको इमोशनल बनाए रखते हैं। दोनों के कई सीन ऐसे हैं जो आपको आंसू दे जाएंगे। फिल्म में ये दोनों अपनी खामोशी से ही सब कुछ बयां कर देते हैं। धर्मेंद्र को देखते वक्त ऐसा लगता है कि ये फिल्म बस चलती रहे और हम उनको सुनते रहें। उनके अभिनय से यह साफ झलकता है कि वो इस फिल्म से पूरी आत्मीयता से जुड़े हुए थे।
जयदीप अहलावत का अभिनय आपको कभी निराश कर ही नहीं सकता। फिल्म के एक छोटे से सीन में आने वाले दीपक डोबरियाल और असरानी भी यहां अपनी छाप छोड़ जाते हैं। नसीरुद्दीन शाह के बेटे विवान शाह का और अनुपम खेर के बेटे सिकंदर खेर का काम भी बढ़िया है। बाकी सभी साथी कलाकारों का अभिनय देखने लायक है। कोई भी निराश नहीं करता।
निर्देशन
एक ऐसी कहानी पर फिल्म बनाना कभी आसान नहीं होता, जिसके बारे में दर्शक पहले से ही जानते हों। ऐसे में निर्देशक की जिम्मेदारी अपने आप और बढ़ जाती है। यहां निर्देशन श्रीराम राघवन जैसे निर्देशक का है और उन्होंने इसे बखूबी संभाला है। उन्होंने वॉर सीक्वेंस और इमोशन दोनों को ही बराबर जगह दी और दर्शकों को ऐसा महसूस नहीं होने दिया कि ये फिल्म बस एक बायोपिक है। फिल्म के कई दृश्यो के जरिए जो भारत और पाकिस्तान के बीच के रिश्ते का वह मैसेज देना चाहते हैं, वो भी साफ-साफ दर्शकों तक पहुंचता है।
क्या खास
फिल्म की कहानी बहुत खास है। यह सिर्फ सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की कहानी नहीं है, बल्कि उनको केंद्रित करके विभाजन का दुख भी दिखाया गया है। सिनेमैटोग्राफी बहुत अच्छी है। चाहे पाकिस्तान का सेट हो या युद्ध के मैदान का एरियल व्यू, प्रोडक्शन टीम की मेहनत साफ दिखती है। कास्टिंग भी दमदार है।
क्या कमी
फिल्म की एडिटिंग कहीं-कहीं आपको कंफ्यूज करती है। युद्ध के कुछ दृश्य कमजोर भी हैं।
म्यूजिक और वीएफएक्स
फिल्म में वीएफएक्स का बहुत ही लिमिटेड इस्तेमाल किया गया है और जहां इस्तेमाल किया गया वहां पर जरूरी और ठीक लगता है। बैकग्राउंड म्यूजिक सटीक है। 'सितारे' गाना खूबसूरत है। 'बन के दिखा इक्कीस' जोश भरता है। बाकी गाने भी ठीक हैं।
देखें या नहीं
दिवंगत कलाकार धर्मेंद्र और देश के वीर शहीद अरुण खेत्रपाल को श्रद्धांजलि देने के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है। फौजियों के जीवन की स्थिति समझने के लिए इसको देख सकते हैं। यकीनन यह ओटीटी पर ज्याद चलेगी पर आप एक बार थिएटर में भी देख सकते हैं। अगर थिएटर में देखने जाएं तो फिल्म के अंत में दिखाया गया डिस्क्लेमर जरूर देखें। अगर आप इमोशल और शांत स्वभाव वाली फिल्में नहीं देख पाते तो यह आपके लिए नहीं है।