फिल्म 'हे कामिनी' की कहानी कामिनी और गौरी की है। दोनों लड़कियों का अपना एक अलग अतीत हैं, लेकिन दोनों एक अच्छी दोस्त होने के बावजूद अपने अतीत के बारे में एक दूसरे से शेयर नहीं करती हैं। कामिनी अचानक एक ऐसे शहर में आ जाती हैं, जहां उसे कोई नहीं जानता हैं। न ही उसके पास मोबाइल फोन हैं और ना ही आधार कार्ड और ना ही कोई एड्रेस प्रूफ कि उसे कोई जॉब दे सके। इसके बावजूद वह लोगों का विश्वास जीत करके अपने लिए जॉब ढूंढती है और उसे रहने के लिए एक छत भी मिलती है। कामिनी का किरदार शुरू से ही संदिग्ध लगता है, हर कोई उसके बारे में जानना चाहता हैं, लेकिन वह सबसे अपनी पहचान छुपाकर रहती है, यहां तक की अपने दोस्त गौरी को भी अपनी असलियत नहीं बताती है।
फिल्म की कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है कामिनी के किरदार के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ती जाती है। और कहानी, एक ऐसे मोड़ पर आकर खत्म होती है कि कामिनी की हकीकत जानकर लोग दंग रह जाते हैं। किसी नए शहर में जब कोई लड़की आती हैं, तो सबसे अहम सवाल यह होता है कि वह खुद को सुरक्षित कैसे रखे। कामिनी रात गुजारने के लिए कैसे चालाकी से एक हॉस्पिटल में घुसती है और दूसरे दिन कैसे एक कैफे में जॉब पाती है, मनचले लड़के से खुद को कैसे बचाती है, इसी भूलभुलैया जैसी पटकथा में दर्शक आखिर तक उलझे रहते हैं।
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फिल्म के माध्यम से निर्देशक मणि शंकर ने बताया है कि एक अकेली लड़की किस तरह से तमाम विपरीत परिस्थियों में अपना एक अलग रास्ता चुनती है। कामिनी के अतीत का पता जब उसकी दोस्त गौरी को चलता है तो वह दंग रह जाती हैं। कभी वह कैफे में नौकरी करती है। तो कभी रोड पर बैठे भिखारी का म्यूजिक वीडियो बनाकर लोगों को भ्रमित करती रहती है कि ताकि वह अपनी सही पहचान छुपा सके। इसके पीछे की भी बहुत ही बड़ी दिलचस्प कहानी हैं, जिसे निर्देशक ने फिल्म में बहुत ही नाटकीय तरीके से पेश किया है। और, उन्होंने यह बात काफी हद तक सिद्ध करने की कोशिश की है कि लड़कियां किसी से कम नहीं होती हैं। वक्त आने पर औरत से बड़ा कोई मर्द नहीं होता है।
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इस फिल्म में कामिनी का किरदार दृशिका चंदर ने बहुत ही सहजता से निभाया हैं, उनके किरदार में मासूमियत भी दिखती हैं, लेकिन जब अपने पिता से अपने हक की बात करती हैं, तो वहां उसका एक अलग ही रूप दिखता है। कामिनी की दोस्त के किरदार में आशिमा वर्धन ने भी बेहतरीन काम किया है तो कामिनी की मां की भूमिका में सुप्रिया कार्णिक अच्छा खासा प्रभाव छोड़ती हैं। फिल्म में उनकी भूमिका भले ही छोटी है, लेकिन जब वह स्क्रीन पर नजर आती हैं तो उनका एक अलग ही व्यक्तित्व नजर आता हैं। गुरु सरन तिवारी, राहुल चौहान, उदय रणवीर सिंह, आदेश पंडित, भुवन कइला के किरदार पर फिल्म के निर्देशक मणि शंकर को थोड़ी सी और मेहनत करने की जरूरत थी। लेकिन उन्होंने ज्यादातर फोकस सिर्फ कामिनी और गौरी के ही किरदार पर रखा है।
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‘16 दिसंबर’, ‘रुद्राक्ष’ और ‘टैंगो चार्ली’ जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके मणि शंकर की फिल्म 'हे कामिनी' भले ही तकनीकी रूप से कमजोर फिल्म है लेकिन उन्होंने एक ऐसी कहानी कहने की कोशिश की है, जो लड़कियों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने इस फिल्म में समलैंगिक जैसे रिश्ते पर भी प्रकाश डालने की कोशिश की है हालांकि इसकी फिल्म की कहानी में कोई उपयोगिता नजर नहीं दिखती हैं। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी, संकलन और बैकग्राउंड स्कोर सामान्य है। इस फिल्म में आठ गाने हैं, जिसमें से 'जिंदगी ने मारी पलटी', 'तू है कहां', 'दिल आवारा' जैसे गीत अच्छे हैं। जापानी संगीतकार केन गोमा इस फिल्म से बॉलीवुड में डेब्यू कर रहे है।