कोई मरने जा रहा हो और उससे पहले अपना दिवाली का बोनस मांगे… गोवा का सबसे बड़ा डॉन बनने के लिए शेफ कॉम्पिटीशन करे.. और एक फिरंगी जो ठीक से हिंदी भी नहीं बोल पा रहा पर मराठी पूरी तरह समझ लेता है..। यह सब देखकर अगर आप हंस सकते हैं तो ही इस फिल्म को देखने जाएं.. वर्ना आप भी मेरी तरह अपना सिर पकड़कर इस फिल्म के खत्म होने का इंतजार करते हुए अच्छे नहीं लगेंगे। चलिए बात करते हैं आमिर खान और वीर दास की नई फिल्म ‘हैप्पी पटेल’ पर और समझते हैं कि यह फिल्म कहां चूक गई ?
हैप्पी पटेल फिल्म रिव्यू
- फोटो : यूट्यूब ग्रैब
कहानी
फिल्म शुरू होती है 1991 के गोवा में चल रही गैंगस्टर जिम्मी (आमिर खान) और दो इंटरनेशनल एजेंट्स के बीच मुठभेड़ से। इस मुठभेड़ में जिम्मी को गोली लग जाती है और एजेंट्स की जान बचाते हुए उनकी काम वाली मर जाती है। काम वाली मरने से पहले दोनों ब्रिटिश एजेंट्स को अपना बच्चा हैप्पी सौंप जाती है, वहीं दूसरी तरफ जिम्मी अपने घर पहुंचकर अपनी बेटी के सामने मर जाता है।
कहानी 2025 में पहुंचती है, जहां हैप्पी (वीर दास) बड़ा होकर अपने एजेंट्स पिता जैसा बनना चाहता है पर उसका इंट्रेस्ट कुकिंग और डांसिंग में ज्यादा है। दूसरी तरफ जिम्मी की बेटी मामा (माेना सिंह) बड़ी होकर गोवा के एक इलाके की डॉन बन चुकी है। मामा अपने कई अवैध धंधों के बीच एक देसी फेयरनेस क्रीम भी मार्केट में उतारना चाहती है जिससे वह अंग्रेजों की फेयरनेस क्रीम को टक्कर दे सके। इस क्रीम को बनाने के लिए मामा ने एक अंग्रेज साइंटिस्ट को कैद कर रखा है, जिसे बचाने के मिशन पर खतरनाक जासूस हैप्पी पटेल, वापस गोवा आता है।
इस मिशन में हैप्पी की मदद गोवा में उसका लोकल कोऑर्डिनेटर गीत (शारिब हाशमी), रॉक्सी (सृष्टि तावड़े) और डांसर रूपा (मिथिला पालकर) करते हैं। अब हैप्पी अपने मिशन में कैसे कामयाब होगा? यह आगे की कहानी है…
फिल्म की कहानी सुनने में तो अच्छी लगती है पर इसे देखते वक्त ऐसा लगता है जैसे कोई टुकड़ों में बेवजह ही आपकाे हंसाने का प्रयास कर रहा हो। हैप्पी बने वीर दास खुद को हिंदी में कमजोर बताकर बार-बार डबल मीनिंग शब्दों का इस्तेमाल करते हैं और यह अंत तक जारी रहता है। कुछ सीन बेहतर हैं, एक-दो जगह हंसी भी आती है पर दो घंटे की फिल्म में इतना काफी नहीं। फिल्म में थोड़ा सस्पेंस हैं, ढ़ेर सारा ड्रामा है और राेमांस भी है। कुल मिलाकर इसमें लॉजिक छोड़कर सब कुछ है।
हैप्पी पटेल फिल्म रिव्यू
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अभिनय
फिल्म के पहले सीन से लेकर आखिरी सीन तक सभी कलाकार ओवरएक्टिंग ही करते दिखते हैं। मैडकैप जोनर की इस फिल्म में कलाकारों से यह उम्मीद थी। आमिर खान बमुश्किल चार सीन के लिए हैं और उनकी ओवरएक्टिंग कतई बर्दाश्त नहीं होती। वीर दास कुछ सीन में बेहतर हैं पर उनका किरदार हैप्पी करने के बजाय दुखी करता है।
मिथिला पालकर ने एक बार फिर अपना टैलेंट वेस्ट किया है। शारिब हाशमी ने ठीक-ठाक काॅमेडी की है। मोना सिंह से न तो डर लगता है और न ही उन्हें देखकर हंसी आती है। उनसे जिस तरह की उम्मीद थी, वैसे उनका किरदार बनाया ही नहीं गया। कुल मिलाकर अभिनय तब अच्छा होता जब कलाकारों को कुछ अच्छा करने के लिए दिया जाता।
निर्देशन
वीर दास ने इस फिल्म से बतौर निर्देशक डेब्यू किया है। उन्होंने अपने निर्देशन में कुछ अलग करने की कोशिश की। उन्होंने कुछ तंज अच्छे भी कसे हैं पर कुल मिलाकर वो इस बात पर गौर करना भूल गए कि ये कहानी भेजा फ्राई कर रही है। न तो वो इसे ‘देली बेली’ बना पाए और न ही ‘गो गोवा गोन’।
हिंदी फिल्मों के दर्शकों को उनसे कुछ बेहतर की उम्मीद थी पर शायद उन्होंने यह फिल्म एक खास वर्ग के लिए ही बनाई है। इमरान खान और शेफ संजीव कपूर जैसे सेलेब्स के कैमियो डालकर उन्होंने फिल्म को चलाने की कोशिश पर ये काफी नहीं हैं।
हैप्पी पटेल फिल्म रिव्यू
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खूबियां और कमियां
खूबियां एक दो हैं पर सच कहूं तो कमियां इतनी है कि वो याद ही नहीं रहतीं। ‘आज बंदा तेरे लिए नाचेगा..’ गाना बेहतर है। इंटरवल से पहले का ट्विस्ट अच्छा था। कुछ एक डायलॉग भी अच्छे हैं। बॉलीवुड फिल्मों से रिलेट करते हुए एक-दो सीन अच्छे बन पड़े हैं। इसके अलावा बाकी पूरी फिल्म में कहानी से लेकर इसे पेश करने के तरीके तक कमियां ही कमियां हैं। क्लाइमैक्स और निराश करता है।
देखें या नहीं
यह फिल्म अंग्रेजी स्लैंग बोलने वाली और डबल मीनिंग जोक्स पर बिना दिमाग का इस्तेमाल किए हंसने वाली ऑडियंस के लिए है। अगर आप खुद को वैसा पाते हैं तो यह फिल्म जाकर देखिए और बीच-बीच में आए हल्के सोशियो पॉलिटिकल तंज पर वाह-वाह करिए।