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फिल्म समीक्षा/सरबजीत: एक दिल को छू लेने वाली कहानी

Sat, 21 May 2016 02:02 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
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निर्माताः ओमंग कुमार/वाशु भगनानी/भूषण कुमार
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निर्देशकः ओमंग कुमार
सितारेः रणदीप हुड्डा, ऐश्वर्या राय बच्चन, ऋचा चड्ढा, दर्शन कुमार
रेटिंग ***

एयरलिफ्ट, नीरजा, अलीगढ़, अजहर के बाद सरबजीत। असल जिंदगी की कहानियां लगातार टिकट खिड़की पर आ रही हैं। निसंदेह पर्दे पर जिंदगी की हकीकत देखने का आकर्षण मन में सहज पैदा होता है। ये घटनाएं समाज और राजनीति के हादसे हैं, मगर इनमें दिल को छूने वाली कहानियां इंसानों की हैं। ओमंग कुमार विश्व चैंपियन बॉक्सर मैरीकॉम (2014) के जीवन पर फिल्म बना चुके हैं, लेकिन सरबजीत उससे बहुत अलग है। यह त्रासद कहानी है, जिसे निर्देशक ने सरबजीत की बहन के नजरिये से पर्दे पर उतारा है।

फिल्म पाकिस्तान की सीमा से लगे पंजाब के एक गांव भीखीविंड के हंसते-खेलते परिवार से शुरू होती है, जिसमें सरबजीत, उसकी पत्नी, दो बेटियां, पिता और बहन हैं। एक रात सरबजीत शराब के नशे में सीमा पार कर लेता है। पाकिस्तानी रेंजर उसे पकड़ लेते हैं। फिर शुरू होता है यातनाओं का सिलसिला, जो सरबजीत से पाकिस्तानी अदालत में बयान दिलाता है कि वह मंजीत सिंह है।
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पाकिस्तान में मंजीत सिंह को 1990 के उन फैसलाबाद और लाहौर बम धमाकों का आरोपी बताया जाता है, जिनमें 14 लोग मारे गए थे। सरबजीत को फांसी की सजा सुनाई जाती है। तब सरबजीत को बचाने के लिए उसकी बहन दलबीर कौर की वो कोशिशें शुरू होती हैं, जो लगता है कभी खत्म नहीं होंगी!
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फिल्म अदाकारी के लिहाज से यादगार है

सरबजीत को फांसी से बचाने और देश लौटाने का संघर्ष कब एक परिवार से पूरे समाज और देश के साथ विश्व स्तर पर चर्चित हो गया, इसकी सही-सही तारीखें नहीं हैं। ओमंग कुमार ने पर्दे पर इसे शिद्दत से उतारा है मगर उन्होंने कहानी को ज्यादा से ज्यादा तथ्यात्मक रखने की कोशिश की। फिल्म थोड़ी कल्पनाशीलता और मानवीय संवेदनाओं के विस्तार की मांग करती है। इसके अभाव में भाव पक्ष कुछ कमजोर रह गया है।

यह भी लगता है कि 13-14 बरस के लंबे अंतराल को दो घंटे से कुछ अधिक में समेटने की मजबूरी में निर्देशक का ध्यान कथात्मक गहराई की जगह वक्त की रफ्तार पर अधिक है। सरबजीत का नारकीय जीवन और उसके परिवार की निरंतर यंत्रणाएं दर्शक को राहत की सांस लेने का मौका नहीं देती। यह फिल्म कलाकारों की बेहतरीन अदाकारी के लिहाज से यादगार है। खास तौर पर सरबजीत के रूप में रणदीप हुड्डा और उनकी बहन दलबीर बनीं ऐश्वर्या राय बच्चन के लिए। अपने किरदार के काल कोठरी की चारदीवारी में कैद होने के बावजूद रणदीप ने इसमें जान फूंक दी है। वह किरदार में समा गए लगते हैं।

ऐश्वर्या ने अपने अभिनय को इस फिल्म में नई ऊंचाई दी है। 22 बरस से 52 बरस तक के उनके रूप और भाव चौंकाते हैं। उन्हें करिअर में लंबी रेस के लिए ऐसी भारतीय भूमिकाओं की जरूरत है। ऋचा चड्ढा पति का इंतजार करती बेबस पत्नी की भूमिका में प्रभाव छोड़ती हैं। जबकि पाकिस्तान में मानवतावादी वकील बने दर्शन कुमार के लिए आप महसूस करते हैं कि उनका रोल और बेहतर निखारा जाता।

ओमंग कुमार ने संवेदनाओं को मैरीकॉम से अधिक सहज होकर पकड़ा और प्रस्तुत किया है। फिल्म में दमदार संवादों की काफी गुंजायश थी, जो यहां नहीं हैं। ओमंग ने सरबजीत के बहाने अपनी बात कहने में थोड़ा संकोच भी बरता है, और कोई ठोस राजनीतिक टिप्पणी नहीं की। अंतः में वह यह बताते हुए बात खत्म करते हैं कि पाकिस्तानी जेलों में चार सौ से अधिक भारतीय और भारतीय जेलों में दो सौ से अधिक पाकिस्तानी कैद हैं।

सरबजीत की कहानी खत्म होते-होते फिल्म रिफ्यूजी (2000) में जावेद अख्तर का लिखा यह गीत याद दिला जाती हैः पंछी नदिया पवन के झोंके/कोई सरहद ना इन्हें रोके/सरहदें इंसानों के लिए हैं/सोचो तुमने और मैंने/क्या पाया इंसा हो के...?
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