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सोना स्पाः आइडिया बेहतर मगर फिल्म औसत

Sat, 23 Mar 2013 12:12 PM IST
रोहित मिश्र
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'सोना स्पा' एक फिक्शन फिल्म है। यह फिल्म हमें बताती हैं कि हम अपनी नींद को ट्रांसफर कर सकते हैं। मतलब हम चौबीसों घंटे काम करें और हमारी जगह पर कोई और यह नींद पूरी करे।
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एक विचार के रूप में यह बात सुननी में जितनी अच्छी और नई लगी उसे पर्दे पर फिल्म के रूप में उतारना उतना ही कठिन दिखा।

फिल्म बनाने के लिए कई मोड़ वाली एक कहानी की जरूरत होती है। इस कहानी में कई रोचक उपकथाएं और घटनाएं भी होती हैं।

'सोना स्पा' फिल्म में यह बातें सिरे से गायब दिखीं। यह फिल्म निर्मल वर्मा शैली की किसी कहानी की तरह चलती है, जहां घटनाएं नहीं सिर्फ पात्रों के मनोविज्ञान पर बात होती है।

फिल्म देख रहे दर्शक को फिल्म का कांसेप्ट तो पसंद आता है, पर वह उससे जुड़ बिल्कुल नहीं पाता। कुल मिलाकर यह फिल्म सिर्फ निर्देशक या उनके जैसी बौद्धिक जुगाली करने वाले कुछ लोगों की फिल्म बनकर रह गयी है।
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कहानी नींद के बिजनेस की
फिल्म की कहानी एक 'सोना स्पा' पर आधारित है। मुंबई का यह स्पा नींद का सौदा करता है। बाबा (नसीरूदीन शाह) इसके संचालक हैं। यहां काम करने वाली लड़कियां स्लीप वर्कर कहलाती हैं।

जो व्यक्ति अलग-अलग वजहों से खुद नहीं सो सकते उनके बदले यहां कोई दूसरा सोता है। इसके लिए वह पैसे चुकाते हैं।

ऋतु (अहाना कुमराह )और रुचा (श्रुति ब्यास) नाम की दो लड़कियां सोना स्पा से जुड़ती हैं। यह दोनों पैसे कमाने के लिए इस स्पा में नहीं आती हैं।

इनकी कहानी अलग है। रूचा अपने करोड़पति पिता के लिए सोना चाहती है जो टेंशन की वजह से सो नहीं पाते।

ऋतु अपनी बड़ी बहन की जगह सोना चाहती है। जो अपने मंगेतर के साथ संबंध के अलावा एक बुरे सपने की वजह से टेंशन में हैं। यह दोनों लड़कियां स्पा में आती हैं और उन्हें अलग-अलग क्लांइट के साथ सोना होता है।

यहां पर ट्वीस्ट तब आता है जब यह लड़कियां अपने क्लाइंट की नींद के साथ उनके सपने भी देखने शुरू कर देती हैं। यह सपने उनके लिए किस तरह से अच्छे या बुरे साबित होते हैं फिल्म इसी बात को जस्टीफाई करने का प्रयास करती है।

ओवरऐक्टिंग नहीं हुई
फिल्म में नसीरूद्नीन शाह ब्राहांम्ड के बैकग्राउंड पर रखी एक भव्य कुर्सी में बैठकर उपदेश देते हैं। बोलने की अदा से वह हमेशा की तरह प्रभावित करते हैं। फिल्म देख रहे दर्शक चाहते हैं कि नसीर का रोल थोड़ा और ज्यादा होता।

स्लीपवर्कर बनीं अहाना कुमराह और श्रुति ब्यास ठीक-ठाक ऐक्टिंग करती हैं। चूंकि फिल्म स्लो टोन पर चल रही होती है तो दर्शकों को यह फिल्म कहीं-कहीं थिएटर जैसी लगने लगती है।

कॉल गर्ल के बाद स्लीपवर्कर बनीं निवदिता भट्टाचार्य अपने सहज ऐक्टिंग से प्रभावित करती हैं। बाकी के कलाकारों ने भी जरूरत के मुताबिक अभिनय किया है।

निर्देशक ने खुद के लिए बनायी फिल्म
हिंदी के साथ अलग-अलग भाषाओं की कई फिल्मों में ऐक्टिंग कर चुके मकरंद देश पांडेय थिएटर से भी जुड़े हैं। 'सोना स्पा' फिल्म उन्हीं के एक प्ले पर आधारित है।

पूरी फिल्म को देखकर लगता है कि यह फिल्म मरकंद ने सिर्फ अपनी संतुष्टि की लिए बनायी है।

एक तरह से उन्होंने अलग किस्म की फिल्म बनाने की अपनी ख्वाहिश पूरी की है। इसके पहले भी वह 'शाहरुख बोला तू खूबसूरत है' और 'हनन' जैसी ऑफबीट फिल्में निर्देशित कर चुके हैं।

अपनी इस फिल्म से वह सामान्य दर्शकों को बिल्कुल प्रभावित नहीं करते। बजट कम होने की वजह से यह फिल्म कई जगह बचकानी भी लगती है। फिल्म का आइडिया नया है इसके लिए उन्हें बधाई दी जा सकती है।
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क्यों देखे
यदि आपको इस बात में दिलचस्पी है कि भारत में इन दिनों अलग-अलग तरह की कैसी फिल्में बन रही हैं।

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