वाशु भगनानी अपने बेटे जैकी भगनानी को लेकर पिछले कुछ सालों से निर्देशक बदल-बदल एक हिट फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस बार उन्होंने प्रियदर्शन का दामन थामा हैं। हिट फिल्म के लिए इस दफे उन्होंने कोई मौलिक कहानी चुनने के बजाय साउथ की एक सफल फिल्म चुनी है।
'रंगरेज' साउथ की एक सुपरहिट फिल्म का हिंदी रीमेक है। तमिल के अलावा यह फिल्म तेलुगू, मलयालम और कन्नड़ भाषा में बन चुकी है। सभी भाषाओं में यह फिल्म सफल रही है।
फिल्म में एक अदद कहानी और कसे हुए प्लाट की वजह से यह जैकी भगनानी की अब तक की सबसे अच्छी फिल्म लगती है। फिल्म दर्शकों का न सिर्फ मनोरंजन करती है बल्कि उन्हें एक संदेश देती हुई भी चलती है।
अच्छी कहानी की वजह से जैकी भगनानी इस फिल्म में उस तरह से एक्सपोज नहीं हुए हैं जैसे कि वह अपनी पिछली फिल्मों में होते आए हैं। इस फिल्म में जैकी जहां-जहां कमजोर पड़े हैं प्रियदर्शन का निर्देशन उस कमी को ढांकने आ जाता है।
प्रियदर्शन जैकी की सीमाएं समझते हैं इसलिए जैकी भगनानी जिस भी सीन में अपने सह कलाकार राजपाल यादव के साथ हैं वहां उन्हें जानबूझ कर उन्हें अंडरप्ले कर दिया गया है। फिल्म की कहानी और पटकथा ऐसी है कि यह हर उम्र के दर्शकों को पसंद आ सकती है। इसे एक पैसा वसूल फैमिली एंटरनेटर फिल्म कहना ठीक होगा।
कहानी दोस्तों और उनके वादों की
यह फिल्म तीन दोस्तों की कहानी है। रिषी (जैकी भगनानी) दोस्तों की इस टुकड़ी को लीड करता है। मुंबई में अचानक उसका एक पुराना दोस्त आता है। वह रिषी को अपनी प्रेमिका के बारे में बताता है। वह ललितपुर जिले के एक दबंग खानदान की लड़की से प्रेम करता है।
रिषी और उसके दोस्त ललितपुर जाकर उस लड़की को अगवा करके उसकी शादी अपने दोस्त से कराने का प्लान बनाते हैं। लड़की अगवा हो जाती है और उसकी शादी भी। इस पूरे घटनाक्रम में रिषी के एक दोस्त की टांग कट जाती है और दूसरा कान में चोट की वजह से बहरा हो जाता है। इन तीनों पर लड़की भगाने का मुकदमा दर्ज होता है।
इस घटना की वजह से रिषी और उसके दोस्तों के पूरे परिवार का ताना-बाना बिगड़ चुका होता है। जिस लड़की मेघा (प्रिया आनंद) से उसकी शादी से तय होती है वह शादी टूट जाती है।
फिल्म में ट्वीस्ट वहां पर आता है जब रिषी को पता चलता है कि जिस दोस्त की उसने इतने रिस्क उठाकर शादी करायी थी वह अलग हो गए है। गोवा में हनीमून बिताने के बाद वह झगड़ कर अलग हो जाते हैं।
यहीं से रिषी और उसके दोस्त अपने उस मौकापरस्त दोस्त को सबक सिखाने का संकल्प लेते हैं। फिल्म के क्लाइमेक्स में यह रहस्य छिपा हुआ है कि रिषी अपने उस दोस्त को कैसे सबक सिखाता है। साथ ही उसके अपने अफेयर का क्या होता है।
इस बार बेहतर है जैकी
पूरी फिल्म जैकी भगनानी को ध्यान में रखकर लिखी गयी है। उसे दोस्तों के एक मसीहा के रूप में पेश किया गया है। ऐसा मसीहा जिसकी अपनी कोई जिंदगी ही नहीं। वह सारे काम अपने दोस्तों के लिए ही करता है। अपने उस रोल को जैकी ठीक-ठाक तरीके से निभा लेते हैं। लंबे और भावुक संवाद बोलने में जैकी बहुत प्रभावी नहीं लगते। चुप रहकर ऐक्टिंग करने में वह बेहतर लगते हैं।
प्रिया आनंद इस फिल्म में नायिका की भूमिका में हैं। प्रिया को हिंदी फिल्म के दर्शकों ने इसके पहले 'इंगलिश-विंगलिश्ा' फिल्म में देखा था। प्रिया का रोल इस फिल्म में भी उतना ही है। बस फर्क यहां इतना है कि वह इस बार वह नायक की प्रेमिका बनी हैं। प्रिया के हिस्से न तो संवाद आए हैं न ही अभिनय के पीस। उनके पास जितना था उन्होंने उसे निभा दिया है। राजपाल यादव सहित बाकी के कलाकार भी अपनी जरूरत के मुताबिक अच्छे लगे हैं।
निर्देशन ही फिल्म की जान
प्रियदर्शन पिछले कुछ सालों से अपने ऊपर लगे कॉमेडी के ठप्पे को हटाने के लिए गंभीर दिख रहे हैं। यह फिल्म भी उन्हीं कोशिशों के तहत है। प्रियदर्शन ने यह दिखाया भी है कि वह कॉमेडी के अलावा दूसरे तरह की भी फिल्में बना सकते हैं।
औसत कलाकारों के बावजूद यदि 'रंगरेज' अच्छी लगती है तो उसकी एकमात्र वजह प्रियदर्शन का निर्देशन है। लड़की किडनैप करने का लगभग दस मिनट का दृश्य उन्होंने बहुत ही खूबसूरती से फिल्माया है। प्रभावी बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ। बुंदेलखंड क्षेत्र में पड़ने वाले ललितपुर के लोगों की जुबान से भोजपुरी बोली बुलवाना फिल्म में उनके कमजोर होमवर्क की तरफ इशारा जरूर करता है।
गाने तो सुनने लायक हैं
फिल्म के गाने अच्छे हैं। इंटरवल के पहले जब फिल्म अपनी रफ्तार पकड़ रही होती है तभी दो अच्छे गाने "दिल को आया रे सुकून" और "गोविंदा आला रे" आते हैं। यह दोनों ही गाने खूबसूरत से लिखे और फिल्माए गए हैं। बैकग्राउंड में दो बार बजने वाला "शिवशंभू" गाना भी दृश्य को सुंदर और प्रभावी बनाता है। "यारों ऐसा है' और फिल्म के आख्रिरी में आया 'गैंगनम' सॉन्ग भी सुनने में अच्छा लगता है।
क्यों देखे
यह एक फैमिली इंटरनेटर फिल्म है। इस फिल्म में सबके लिए कुछ न कुछ है।
क्यों न देखे
यदि आप इसकी तुलना 'जिंदगी मिलेगी न दोबारा', 'दिल चाहता है' या 'रॉक ऑन' जैसी दोस्ती की फिल्मों से करके देखने जा रहे हों तो।