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शुद्घ तो नहीं पर नया जरूर है यह देसी रोमांस

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प्यार को चमत्कार मानने वाली यशराज बैनर की फिल्में अचानक ही बदल गई हैं। शुद्घ देसी रोमांस तो और भी बदली हुई फिल्म है। अब यहां प्यार का इजहार स्वीटजरलैंड की हंसी वादियों में न होकर जयपुर में अकेले रह रही बैचलर लड़की के बिखरे हुए कमरे में होता है। लेकिन यह प्यार इतना सीधा और सपाट नहीं हैं कि लड़का-लड़की एक- दूसरे से आई लव यू कहे और बस हो गया।
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देखने में तो फिल्म का प्लाट प्रेम त्रिकोण जैसा लगता है लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं। यह प्रेम को लेकर भ्रमों की कहानी है। शुद्घ देसी रोमांस को एक फिलॉसफिकल फिल्म भी कह सकते हैं। यहां फिलॉसफी प्यार हो जाने के बाद की है। फिल्म में 24 या 27 जितने भी किस सीन बताए जा रहे हैं वे एक खास वर्ग को आकर्षित करने के लिए हैं।

फिल्म की मूल थीम प्यार, शादी की जरूरत, शादी की दुश्वारियां और लिव इन रिलेशनशिप की जरूरतों पर बहस करने की है जो कई बार गंभीर भी हो जाती है। अपने अंतिम सीन में शुद्घ देसी रोमांस भारत की विवाह पद्घति पर बिना निशान छोड़े एक चुटकी काटकर निकल जाती है।
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फिल्म का निर्देशन आकर्षित करता है। फिल्म की कहानी भी बड़ी खूबसूरती के साथ लिखी गई है। हर पात्र अपने कैरेक्टर में हैं और संवाद दृश्य के अनुरूप। एक जरूरी पर देखे जानी वाली फिल्म।

कहानी मंडप से बाथरूम जाने की

फिल्म की कहानी रघुराम सीताराम (सुशांत सिंह राजपूत) की विवाह यात्रा से शुरू होती है। यह यात्रा बारात लगे इसके लिए एक किराए की बहन गायत्री (परिणिती चोपड़ा) के अलावा कुछ बाराती भी पैसे देकर जुटाए जाते हैं। अपनी होने वाली पत्नी तारा (वानी कपूर) के गले में वरमाला डालने से पहले रघु जनातियों से उनके घर के बाथरूम का रास्ता पूंछता है। लेकिन वह बाथरूम न जाकर जयपुर की बस पकड़ता है।

कोई 15 दिनों के बाद रघु अपनी उसी किराए की बहन गायत्री से मिलता है। दोनों तरफ से मोहब्बत का इजहार होता है और ये साथ रहना शुरू कर देते हैं। अब बारी गायत्री और रघु की शादी की होती है। फेरों के ठीक पहले जब रघु इस शादी से बचकर भागने की सोच रहा होता है तभी उसे गायत्री के भाग जाने की खबर मिलती है। ट्वीस्ट यही खत्म नहीं होते हैं। रघु की जिंदगी में फिर से तारा आती है।

माफी और मान मनौती के बाद इनके बीच रोमांस शुरू होता है। अब एक शादी में इन दोनों को ही गायत्री मिलती है। इसके आगे की कहानी हम आपको नहीं बताएंगे। लेकिन इस फिल्म में वैसा कुछ भी नहीं होता है जैसा हिंदी की सैकडों प्रेम त्रिकोण कहानियों में हो चुका होता है।

हर किरदार प्रभावित करता है

फिल्म की पिच और रफ्तार थोड़ी स्लो होने के बावजूद यदि फिल्म हमें अपने से जोड़कर रखती है तो इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह कलाकारों का अभिनय है। हर कलाकार ने अपने किरदार में घुसकर ऐक्टिंग की है। 'काई पो चे' के बाद अपनी दूसरी फिल्म सुशांत कमाल करते हैं। चूंकि इस फिल्म को निर्देशित करने वाले मनीष शर्मा अपनी पहली दो फिल्में रणवीर सिंह के साथ कर चुके हैं इसलिए सुशांत कहीं-कहीं रणवीर जैसे भी लगे हैं।

एक अफेयर खत्म करके दूसरे अफेयर में कूद जाने वाली लड़की बनी परिणिती चोपड़ा अपनी स्वाभविकता और आंखों से उसी तरह से प्रभावित करती हैं जैसा उन्होंने 'इशकजादे' में किया था। अपने आत्मविश्वास से वानी कपूर कहीं से भी यह झलकने नहीं देती हैं कि यह उनकी पहली फिल्म है। शादी कराने वाले एक वेडिंग प्लानर के रूप में ऋषि कपूर ने अपनी इमेज के अनुरूप ही शानदार अभिनय किया है।

मेच्योर लगा मनीष का निर्देशन

यह मनीष शर्मा और जयदीप साहनी की मिली जुली फिल्म है। फिल्म का फ्रेम यदि निर्देशक का होता है तो उसके पीछे का वातारवरण जयदीप साहनी बना रहे होते हैं। दोनों ने मिलकर फिल्म को खूबसूरत बनाया है। मनीष शर्मा ने इसके पहले 'लेडीज वर्सेज रिक्की बहल' और 'बैंड बाजा बारात' का निर्देशन किया है। कहीं-कहीं आपको यह फिल्म मनीष शर्मा की उन्हीं फिल्मों का बदले हुए स्वरूप में विस्तार लगती है।
 
लेकिन जहां यह फिल्म अपने पात्रों की जटिलता और उनके मनोविज्ञान की बात करने लगती हैँ वहीं से आपको एक बदले हुए मनीष दिखते हैं। फिल्म का सेकेंड हॉफ थोड़ा स्लो है। घटनाएं कम और एक जैसी हैं। नायक का मंडप से बार-बार बाथरूम जाना भी एक समय के बाद अखरने लगता है।

ये इस फिल्म की कुछ कमजोरियां है। क्लाइमेक्स भी उतना तूफान लेकर नहीं आता है जिसके दर्शक अपेक्षा कर रहे होते हैं। पर मनीष की सबसे बड़ी खूबी कलाकारों से फिल्म के पात्रों की जरूरत का अभिनय करवा लेना है।

गाने मजेदार और फिल्मांकन भी

फिल्म में भले ही फिल्म का नाम प्रतिबिंबित न हो रहा हो लेकिन गाने शुद्घ देसी किस्म के ही हैं। "तेरे बीच में क्या है" एक खूबसूरत बातचीत करने वाला गीत है। सुनिधि चौहान और मोहित चौहान की सुनी हुई आवाजों के बावजूद यह गाना नया सा लगता है। "गुलाबी" गाना भी अपने फिल्मांकन के साथ ही सुनने में भी उम्दा है। फिल्म में बैकग्राउंड में टुकड़े-टुकड़े में आए कई गाने दृश्यों को एक सहारा ही देते हैं।

क्यों देखें

एक ऐसी फिल्म के लिए जो देखने प्रेम त्रिकोण तो लगे लेकिन जिसमें प्रेम त्रिकोण जैसा कुछ भी न हो। पर यहां कुछ ऐसा हो जो फिल्मों में आमतौर पर नहीं होता आया हो।
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क्यों न देखें

यदि आपको रोमांस में भी लॉर्जर दैन लाइफ का फॉर्मूला चाहिए। वैसा ही जैसा अपने लुक के लिए साउथ के अभिनेता मूंछे रखते नहीं बल्कि पहनते हैं।
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