'आत्मा' फिल्म की खास बात यह है कि इस फिल्म की मेकिंग स्टाईल और क्लाइमेक्स दूसरी भुतही फिल्मों से अलग है। फिल्म में न तो गंदा से मेकअप किए हुए भुतहे चेहरे हैं और न ही बेवजह की चीख-चिल्लाहट। यह बात 'आत्मा' को पांरपरिक भुतही फिल्मों से अलग तो करती हैं लेकिन उसे उनसे बेहतर नहीं बना पाती।
फिल्म में ऐसे-ऐसे लंबे भुतहे दृश्य नहीं हैं जो आपको सीट से चिपका दें। साथ ही डर का ऐसा ताना-बाना भी आपके इर्द-गिर्द नहीं होता कि आप अंदर-अंदर ही डर को महसूस करें।
भूत का इंसान की तरह दिखना भी फिल्म का एक कमजोर पक्ष है। जल्दबाजी में समेट दी गयी इस फिल्म का क्लाइमेक्स कमजोर और अधूरा सा है। दर्शकों को यह जल्दबाजी सबसे ज्यादा अखर सकती है।
यह फिल्म हॉरर फिल्मों की कुछ उन जरूरी बातों को नजरंदाज भी करती है जो घिसी-पिटी होने के बावजूद जरूरी होती हैं। 'आत्मा' एक ऐसी फिल्म है जो देखी तो सकती है पर ज्यादा अपेक्षाओं के साथ नहीं।
कहानी 'पापा' के वापस आने की
अभय (नवाजुद्नीन सिद्दकी) और माया (बिपाशा बसु) का दांपत्य जीवन तनावपूर्ण चल रहा है। यह दोनों एक दूसरे को तो बिल्कुल पंसद नहीं करते लेकिन अपनी बेटी निया से बेइंतहा प्यार करते हैं।
अभय और माया के बीच तलाक हो जाता है। तलाक के बाद अभय एक रोड एक्सीडेंट में मारा जाता है। मरने के बाद अभय फिर से उसी घर में आ जाता है। वह निया को लेने आया होता है।
यहीं से रहस्यमयी घटनाएं शुरू होती हैं। स्कूल से लेकर घर तक में जो भी निया को परेशान करता है अभय का भूत उन्हें मार देता है। निया, अभय के भूत से बात करती है। स्थितियां बुरी होती जाती हैं और एक-एक करके सब मरने शुरू हो जाते हैं।
फिल्म का क्लाइमेक्स इस बात में है कि माया किस तरह से अभय से निया को बचाती है। भूत को मारने का लिए खुद भी भूत बनने का तरीका इसे बाकी फिल्मों से अलग बनाता है।
बिपाशा फिट बैठी हैं रोल में
बिपाशा बसु पिछले कुछ समय भुतही फिल्मों का हिस्सा बन गयी हैं। भुतही फिल्मों में डरने का स्वाभाविक अभिनय करना होता है उसे बिपाशा अच्छे से पर्दे पर उतार देती हैं। बिपाशा डरने के साथ-साथ डरा भी सकती हैं। यदि वह चुड़ैल की भूमिकाओं में और बेहतर लग सकती हैं।
नवाजुद्दीन सिद्दकी कि इमेज इस तरह की है कि वह पर्दे पर भूत के किरदार में फिट नहीं बैठते। नवाजुद्दीन की स्वाभाविक डायलॉग डिलवरी और भूत की बोलने की स्टाईल कई जगह मैच नहीं करती। उन्होंने अभियन अच्छा किया है पर भूत का रोल उन पर शूट नहीं करता।
छोटी बच्ची के रूप में डोयल धवन ने कमाल का अभिनय किया है। छोटे-छोटे किरदार अच्छे हैं और वह ओवरऐक्टिंग नहीं करते।
निर्देशन अच्छा, विषय का चुनाव खराब
सुपर्ण वर्मा इसके पहले 'एसिड फैक्ट्री' और 'एक खिलाड़ी एक हसीना' जैसी फिल्में निर्देशित कर चुके हैं। उन्होंने 'अगली और पगली', 'जमीन' और 'लव स्टोरी 2050' के अलावा कुछ अन्य फिल्मों का स्क्रीनप्ले लिखा है।
फिल्म में सुपर्ण एक निर्देशक के रूप में कमजोर नहीं हैं। उनकी कमजोरी फिल्म के विषय और उसके ट्रीटमेंट को लेकर है। फिल्म देखकर लगता है कि उनके दिमाग में यह बात हमेशा चल रही होगी कि उन्हें एक अलग भुतही फिल्म बनाना है।
इस अलग के फेर में वह हॉरर फिल्मों के कई जरूरी इलीमेंट मिस करते हैं, खासकर कमजोर क्लाइमेक्स मजा किरकिरा कर देता है।
एक ही गाना पर अच्छा
फिल्म में गाने नहीं हैं। एक गाना जो कॉस्टरील चलने के साथ सुनाई देता है वह सुनने में अच्छा लगता है।
क्यों देखे
यदि एक कम डरने वाली एक भुतही फिल्म देखना चाहती हों। जहां मुखौटे लगाकर या गंदा से मेकअप करके डराने का प्रयास नहीं किया गया है।
क्यों न देखें
यदि आप इस चैलेंज के साथ फिल्म देखने जाते हों कि भुतही फिल्म उन्हें कितना डराएगी।