ईश्वर एक है। अगर आप यह मानते हैं तो पीके देखने के बाद आपको लगेगा कि ईश्वर दो हैं। एक वह जिसने हमें बनाया। दूसरा वह जिसे धर्म के ठेकेदारों ने बनाया। हमें किस ईश्वर को मानना चाहिए, इस सवाल का जवाब खुद ही तय करना होगा। निर्देशक राजकुमार हिरानी की बहुप्रतीक्षित फिल्म पीके धर्म और ईश्वर को लेकर एक रोचक बहस सामने रखती है और गुदगुदाते हुए काफी कुछ सोचने को मजबूर करती है।
विज्ञापन
इसमें रोजमर्रा की जिंदगी में ईश्वर की मौजूदगी को लेकर कई मासूम सवाल हैं तो उतने ही मासूम जवाब भी। हमेशा की तरह आमिर खान ने कोई कसर नहीं उठा रखी है। लेकिन फिल्म का विषय तरोताजा इसलिए नहीं लगता क्योंकि ज्यादा समय नहीं गुजरा जब आप ईश्वर के अस्तित्व और उस तक पहुंचाने का दावा करने वाले ठेकेदारों की कहानी ‘ओ माई गॉड’ में देख चुके हैं।
हिरानी की फिल्म की बहस का प्लेटफॉर्म वही है, जो निर्देशक उमेश शुक्ला की फिल्म का था। हिरानी को यह फिल्म बनाने में पांच साल लग गए, इसका एक कारण यह भी बताया जाता है कि ‘ओ माई गॉड’ बीच में आ गई। हिरानी को तब स्क्रिप्ट में काफी बदलाव करने पड़े। स्क्रिप्ट की उधेड़बुन पीके में कुछ दृश्यों में साफ नजर आती है।
विज्ञापन
आमिर निकले एलियन
फिल्म के प्लॉट को निर्माता-निर्देशकों-ऐक्टरों ने आखिरी वक्त तक सबसे छुपा कर रखा क्योंकि हर कोई इसकी कहानी और आमिर के किरदार को जानने को उत्सुक था। परंतु हॉल में पहला सीन आते ही रहस्य पर से पर्दा उठ जाता है, जब आसमान से धरती पर राजस्थान के एक रेगिस्तानी इलाके में अंतरिक्ष यान उतरता है और उसमें से आमिर निकलते हैं। यह यान दूसरे ग्रह से आया है और आमिर उस ग्रह के प्राणी हैं।
आमिर के जिस नग्न पोस्टर पर बवाल था, उस दृश्य के मायने आप पहले कुछ मिनटों में समझ जाते हैं। आमिर अनुष्का से जब अपनी कहानी कहते हैं तो बताते है वह अपने ग्रह के एस्ट्रोनॉट (अंतरिक्षयात्री) हैं। उनके ग्रह पर लोग कपड़े नहीं पहनते। वहां भाषा नहीं है क्योंकि वे लोग अपने मस्तिष्क को दूसरे से कनेक्ट करके सीधे बात करते हैं। आमिर धरती के लोगों को समझने की उत्सुकता के साथ आए हैं।
लेकिन जैसे ही वे यहां कदम रखते हैं कुछ ही मिनटों में लूट लिए जाते हैं। एक व्यक्ति अंतरिक्ष यान से उन्हें कनेक्ट करने वाला रिमोट कंट्रोल छीन कर भाग जाता है। इसी छीना-झपटी में आमिर के हाथों में लुटेरे का ट्रांजिस्टर रह जाता है। शुरू से आखिर तक कहानी में अनुष्का के अलावा कोई नहीं जानता कि आमिर एक एलियन हैं।
मजबूत कंधे और लंबी दौड़
फिल्म पूरी तरह से आमिर के कंधों पर है। अपनी मजबूत टांगों पर वह खूब भागे भी हैं। एक मासूम के रूप में वह कई तार्किक सवाल करते हैं जिनका ज्यादातर संबंध ईश्वर से है। कारण यह कि लोगों के लिए पहेली बना हुआ यह एलियन अक्सर अपने बारे में सुनता है कि इसकी मुश्किलों का रास्ता तो भगवान ही निकाल सकते हैं।
यह एलियन भगवान को ढूंढने निकल पड़ता है और पाता है कि धरती पर एक नहीं कई भगवान हैं। उनका कोई एक ठिकाना नहीं है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च और भी कई जगहें। इससे भी बड़ी मुश्किल यह है कि भगवान के कारोबार को संभालने के लिए ढेर सारे ‘मैनेजर’ हैं। इनसे पार पाना कठिन है। इसी कहानी में एक लव स्टोरी है, अनुष्का शर्मा और सुशांत सिंह राजपूत की।
जिसका कनेक्ट भी एक धर्मगुरु तपस्वी से है। आमिर से लूटा गया रिमोट तपस्वी के पास पहुंच चुका है, जो भक्तों को बताता है कि यह चमकती हुई चीज भगवान शंकर के डमरू से गिरा हुआ एक टुकड़ा है। आमिर अपना रिमोट यंत्र वापस पाना चाहते हैं। कहानी की यह बुनावट सहज है। लेकिन नायिका एक टीवी रिपोर्टर है और एलियन की कहानी और उसके सहज सवालों से इतनी प्रभावित होती है कि अपने चैनल में उसे सवाल-जवाब का एक कार्यक्रम दिला देती है।
फिल्म अचानक यहां तार्किक रूप से कमजोर हो जाती है और यहां से कहानी कम और धर्म तथा ईश्वर से जुड़े कारोबार की बहस का अखाड़ा बन जाती है। आपको यह पसंद आया तो ठीक, वर्ना यहां से आप फिल्म में दिलचस्पी खो सकते हैं।
अपनी आस्था संभाल कर देखें
अगर आप इस फिल्म को मुन्नाभाई या थ्री इडियट्स की छाया लेकर देखने जाएंगे तो आनंद नहीं ले सकेंगे। एक तो यह विषय बिल्कुल अलग है और दूसरे हिरानी इस फिल्म की कहानी कहने में पिछली फिल्मों जैसा करिश्मा नहीं कर सके। यह भी हो सकता है कि आपकी आस्था को कहीं हंसी-मजाक में चोट पहुंच जाए।
खास तौर टॉयलेट में भगवान शिव के साथ आमिर खान के दृश्य या फिर अल्लाह के घर में वाइन की बोतल लेकर घुसने का प्रयास करते आमिर को देख कर। ईसाई भी इस बात का बुरा मान सकते हैं कि कैसे इस एलियन को चर्च में नारियल-अगरबत्ती और दीया जला कर पवित्र क्रॉस के सामने ले जाते दिखा दिया गया।
इसके अलावा ईश्वर तथा धर्म पर कई संवाद हैं जिन्हें आप अगर दिल पर ले लेंगे तो आस्था को ठेस पहुंच जाएगी। अतः यह वैधानिक चेतावनी आवश्यक है कि अपनी आस्था को घर में रख कर यह फिल्म देखने जाएं। तभी आप हंस सकेंगे।
राजकुमार हिरानी की यह फिल्म पिछली फिल्मों से एक मायने में बहुत अलग है। वे फिल्में किसी एक सितारे के भरोसे नहीं थीं और उन कहानियों में हर किरदार की जगह अहम थी। पीके में ऐसा नहीं है। आमिर और अनुष्का को छोड़ दें तो बाकि ऐक्टर एक्स्ट्रा की तरह नजर आते हैं। चाहे संजय दत्त हों या बोमन ईरानी। दोनों की कहानी में कोई विशेष जगह नहीं है।
सुशांत सिंह राजपूत और परीक्षित साहनी की भी स्थिति यही है। धर्मगुरु बने सौरभ शुक्ला आकर्षित नहीं करते। पीके में आमिर के अलावा कोई और याद नहीं रहता। अनुष्का जरूर खूबसूरत लगी हैं और यह फिल्म उनके करियर को फायदा पहुंचाएगी।
यह पहला मौका है जब हिरानी ने सारे कलाकारों की प्रतिभा के साथ न्याय नहीं किया। फिल्म के संगीत को लेकर भी कहा जा सकता है कि यह बहुत आकर्षक नहीं है। मूलमंत्र यही कि जितनी कम उम्मीद लेकर जाएंगे, उतना ज्यादा आनंद पाएंगे।