अब तक आप पिज्जा खा रहे होंगे लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद आपको पिज्जा को देखकर रुह कांप उठेगी।
हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाबी खो जाए। सोचिए कि यह गाना रोमांटिक नहीं है। सोचिए कि यह भुतहा गाना है। एक कमरे में भूत और आप बंद हो जाएं! फिर चाबी खो जाए! फिल्म पिज्जा की बुनावट इसी सूत्र में है। यह बॉलीवुड में बनने वाली रूटीन किस्म की घटिया भुतहा फिल्मों जैसी नहीं है। उनसे कहीं बेहतर है।
यह सचमुच एक रोचक कहानी है। जो आपको शुरू से अंत तक बांधे रखती है। बेसिर-पैर का ड्रामा नहीं। यह फिल्म बॉलीवुड में रामसे की विरासत संभाल रहे भट्टों, वर्माओं और एकताओं के लिए पक्का सबक है। ये लोग एक भुतहा परिस्थिति को सुलझाने के लिए किसी ओझा-गुनिया और सनकी मनोविज्ञानी या पराविज्ञानी से आगे कुछ सोच ही नहीं पाते।
शुरुआत से ही आपको इनकी फिल्म का अंत पता होता है। लेकिन पिज्जा में ऐसा नहीं है। यह चालू फार्मूलों से आगे की और अलग फिल्म है। सुंदर है। फिल्म का हॉरर ऐसा नहीं है कि आप कुर्सियों से गिर पड़ें या बाजू वाले की बांह पकड़ लें। भुतहा होने के साथ इसमें रोमांच भी है। हालांकि ऐसा नहीं कि इस फिल्म में कमियां ही नहीं हैं। कुछ कमियों के बावजूद यह फिल्म अपने कथानक के कारण अवश्य देखने योग्य है।
फिल्म नवदंपति कुणाल (अक्षय ओबेराय) और निक्की (पार्वती ओमनाकुट्टन) की कहानी है। कुणाल एक कंपनी में पिज्जा डिलेवरी बॉय है और निक्की स्ट्रलिंग राइटर, जो सदा भुतहा किस्से-कहानी लिखती रहती है। एक दिन पता लगता है कि निक्की गर्भवती है, लेकिन कुणाल का मानना है कि उनके हालात ऐसे नहीं हैं कि घर में एक और सदस्य का खर्च उठा सकें।
दोनों में विवाद होता है, मगर जल्द ही सुलझ जाता है। उनका जीवन पटरी पर है और तभी आप पाते हैं कि एक दिन कुणाल ऐसे बंगले में पिज्जा डिलीवर करने पहुंचता है जहां अंदर जाते ही दरवाजे बंद हो जाते हैं। अंदर भूत हैं...! अब कुणाल बाहर कैसे निकले...? एक के बाद एक रोमांचित करने वाली घटनाएं सामने आती हैं। पहेली की तरह सब कुछ उलझता जाता है और फिर सुलझता भी है।
कहानी फिल्म की हीरो है। ऐसी कहानियां ही सितारे पैदा करती हैं और ऐसी कहानियां ही सितारों के बगैर भी अपनी चमक के साथ सामने आती हैं। अक्षय, रिश्ते में विवेक ओबेराय के भाई लगते हैं। कुणाल की भूमिका वह खरे उतरे हैं। जबकि पार्वती के पास पर्दे पर मौका कम था। फिर भी वह अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाती हैं।
फिल्म में और भी कलाकार हैं, उनकी भी अपनी भूमिकाएं हैं। परंतु उनके बारे में बात करने से कहानी का रोमांच कम हो सकता है। फिल्म की फोटोग्राफी अच्छी है। 3डी में इसका मजा अलग है। इस पिज्जा के डीवीडी बॉक्स का इंतजार करने से बेहतर है कि सिनेमाघर में जाकर आनंद उठाएं। स्वाद जुबान पर देर तक रहेगा। इस हफ्ते रिलीज हो रही पांच फिल्मों में यह सबसे बढ़िया है।