सुभाष घई लंबे समय के बाद कांची फिल्म से अपनी वापसी कर रहे हैं। इस बार उनके साथ एक सुंदर हीरोइन भी है। जानिए फिल्म कैसी?
फिल्म देखते हुए सवाल पैदा होता है कि क्या सुभाष घई आज बन रही फिल्में देखते भी हैं या वक्त मिलने पर अपनी ही बनाई फिल्में देखते हैं। ‘कांची’ का ऊपरी तानाबाना भले ही आज का दिखे, लेकिन अंदर का नजारा अस्सी और नब्बे के दशक का है।
कभी शो मैन कहलाने वाले घई बीते डेढ़ दशक से फ्लॉप पर फ्लॉप फिल्में बना रहे हैं। यह बात उनके प्रशंसकों को खटकती है। ‘कांची’ उनके दुख को बढ़ाने का ही काम करती है।
ढाई घंटे की इस फिल्म की कहानी तो कमजोर है ही, घई के निर्देशन का जादू भी यहां गायब है। वह कर्णप्रिय संगीत भी यहां नहीं है, जो उनकी फिल्मों की पहचान होता है। यहां अगर कुछ है तो कमजोरी से गढ़े गए सीन और कुछ घटनाओं को स्थापित करने के लिए कमजोर तर्क।
कांची (मिष्ठी) एक शहीद फौजी अफसर की बेटी है। उत्तराखंड की ऊंची पहाड़ियों में बसे गांव कोशंपा में रहती है। वह मौत से नहीं डरती। तू-तड़ाक और गालियों से बात करने में उसे रत्ती भर संकोच नहीं होता। गांव के घर-घर को पता है कि कांची गांव के ही एक और फौजी के बेटे बिंदा (कार्तिक) के लिए बनी है। दोनों में प्यार है।
कहानी में ट्विस्ट यह कि गांव की जमीन पर काकड़ा ब्रदर्स (मिथुन और ऋषि) की नजर है और वह इस खूबसूरत घाटी में एक अत्याधुनिक नगर बसाना चाहते हैं। बड़ा भाई मंत्री और छोटा बिल्डर। बड़े भाई का एक बेटा भी है, जिसे कांची पसंद आ जाती है। बिंदा इस तिकड़ी के अरमानों का रोड़ा है। वे उसे रास्ते हटा देते हैं। फिर जिस अंदाज में कांची इन लोगों को अंजाम तक पहुंचाती है उसे देख कर लगता है कि बच्चों का खेल चल रहा है।
फिल्म पूरी तरह से निराश करती है। इसके कैमरावर्क और मिष्ठी के सौंदर्य को छोड़ दिया जाए तो राहत का कोई साधन यहां नहीं है। घई को भले ही लगता रहा हो कि उनकी ‘कांची’ अनब्रेकेबल है, लेकिन कामयाबी का उनका सपना फिलहाल चकनाचूर ही है।