कंगना इस बार फिर एक नए अवतार में हैं। यह ऐसी फिल्म है जहां हर फिल्मी मसाला अलग और नए कलेवर के साथ है।
ठांय ठांय... सुबै की राम राम नगद और साम की राम राम एडवांस! निर्देशक साई कबीर कुछ इसी अंदाज में पहले दृश्य से दर्शक को ऐसे बांधते हैं कि सोचने का मौका नहीं देते।
सिनेमा की दुनिया को यह उनका पहला सलाम है और वे अपनी प्रतिभा से भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं। तोते की जान चुड़ैल में बसती है। तोते की गर्दन मरोड़ दी जाए तो चुड़ैल अपने आप मर जाती है। कबीर की कहानी कुछ इसी अंदाज में शुरू होती है। इसमें चंबल के पानी की तेज धार है। उस जमीन का तेवर है।
फिल्म ग्वालियर (म.प्र.) में राजनीति और अपराध की कहानी है। लेकिन इसके जानलेवा माहौल में एक प्रेम कहानी बंदूक की गोली-सी छूटती है और दिल पे आ लगती है। अलका सिंह (कंगना रनौत) का रिवॉल्वर से रिश्ता ऐसा है कि उसने बाप की मौत का बदला तो लिया, बेवफाई करने वाले पति के अंदर भी चौदह गोलियां उतार दी।
लेकिन उसे दुख यह कि वह बांझ है। अलका के विधानसभा चुनाव हारने और उसके प्रतिद्वंद्वियों के उसे ठिकाने लगा देने के इरादों से शुरू होने वाली इस कहानी में प्रेम की एंट्री होती है बॉलीवुड में हीरो बनने का सपना देखने वाले रोहन कपूर (वीर दास) के साथ।
‘क्रेजी अंडरवीयरः चंबलः डूड नंबर 1’ प्रतियोगिता के साथ रोहन अनीता का दिल भी जीत लेता है। फिर शुरू होता है चूहे-बिल्ली का खेल। दो तरफा घात-प्रतिघात के बीच खेल खूनी अंजाम तक पहुंचता है। जिसमें अनीता का मामा बल्ली (पियूष मिश्रा) अहम भूमिका निभाता है।
फिल्म रोचक है और कहानी तथा संवादों में लुगदी उपन्यास के जैसा मजा देती है। अगर आपने कभी इनका रस लिया है तो सिनेमाघर के अंधेरे में दम साधे बैठे रहते हैं। कहानी के वाले उतार-चढ़ाव में गहरा कॉमिक टोन भी है। फिल्म की जान कंगना रनौत हैं। कुछ हफ्तों पहले ‘क्वीन’ में वह अपनी सादगी और संकोच के साथ जैसे दिल में उतरी थीं, उसके ठीक उलट यहां उनका अंदाज कटारी की तरह सीने से आर-पार होता है।
जिन्होंने ‘क्वीन’ में उन्हें सराहा, उन लोगों को ‘रिवॉल्वर रानी’ में उनकी रेंज अवश्य देखनी चाहिए। कंगना हमारे वक्त की सबसे शानदार अभिनेत्री तो हैं, संभवतः अकेली हीरोइन हैं जो आग और पानी से एक साथ खेल सकती हैं। जबकि हमारे ज्यादातर बड़े हीरो तक ऐसा जोखिम नहीं उठा पाते। अतः अगर फिल्म कहती है कि अब मर्द को दर्द होगा तो कई सितारे अपना दर्द मिटाने के लिए कंगना के साथ जरूर काम करना चाहेंगे।
बदसूरत और तमाम कमियों से भरपूर अलका के रूप में कंगना कुछ ऐसी हैं कि कोई उन्हें प्यार न करे। लेकिन अलका में प्यार की जबर्दस्त भूख है। दो विपरीत छोरों के मध्यबिंदु पर अगर अलका का जलवा दिखता है तो यह कंगना के अभिनय की वह क्षमता है जिसे किसी पुरस्कार से नहीं तौला जा सकता।
यहां वीर दास ने भी अपना काम बखूबी अंजाम दिया है। हिंसा और राजनीति की कहानी में वह लालच का चेहरा हैं। अंत तक आते आते जिससे आप नफरत करने लगते हैं। लेकिन यही बात एक कलाकार के लिए शाबाशी है। पियूष मिश्रा फिल्म के दूसरे हिस्से में उभरते हैं। फिर भी कंगना और वीर से कुछ कम रह जाते हैं।
यह फिल्म में उनके लिए रचे गए किरदार से संबंधित मामला है।साई कबीर के निर्देशन में तो नहीं लेकिन कहानी के चयन पर जरूर तिग्मांशु धूलिया की छाप है। परंतु अंग्रेजी में कहावत है कि एक रंग-रूप वाले पक्षी ही एक डाली पर बैठते हैं। अगर आप जूहू-बांद्रा की ग्लॉसी मुंबइया कहानियों में नहीं खो जाते हैं तो ‘रिवॉल्वर रानी’ से मुठभेड़ जरूर मजा देगी।