लड़का-लड़की एक-दूसरे से प्यार करते हैं। दिल्ली का यह लड़का बिल्कुल देसी है। फुद्दू-सा। जबकि अंबाला की लड़की तीखी है। ततैया जैसी। लड़की का पिता सख्त है और उसकी शादी अपनी पसंद के लड़के से करना चाहता है क्योंकि बड़ी बेटी को लव मैरिज करके जिंदगी गर्क करते देख चुका है। छोटी के बारे में रिस्क उसे मंजूर नहीं। पिता ने बेटी के लिए अमेरिका का एक एनआरआई डॉक्टर ढूंढा है, जो देखने में किसी मॉडल से कम नहीं।
हालांकि छोटी अगर चाहे तो प्रेमी उसे भगा भी सकता है, लेकिन वह चाहता है कि लड़की के घरवालों का दिल जीते! दिलवाला बन कर दुल्हनिया को विदा कराए!! इस स्टोरी लाइन पर आपको ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ की याद आए तो आश्चर्य ना करें। भरोसा करें कि ‘हम्टी शर्मा की दुल्हनिया’ भी वही है। कलाकार नए हैं। अंदाज नया है। जमाना बदल गया है। लेकिन यहां सब कुछ शाहरुख-काजोल स्टारर क्लासिक की लाइन पर चलता है। इसके लिए करन जौहर ने पर्दे पर निर्देशक आदित्य चोपड़ा का विशेष आभार जताया है।
एक पुरानी फिल्म की ही कॉपी
चकित करने वाली बात यह है कि ‘हम्टी शर्मा की दुल्हनिया’ पूरी तरह से ‘दिलवाले दुल्हनिया’ की रीमेक है। फिल्म में ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ का पूरा का पूरा प्लॉट उठा लिया गया है। यहां तक कि नई फिल्म को पुरानी फिल्म से जोड़ने के लिए यह भी दिखाया गया है कि हीरो और उसके दोस्त शाहरुख-काजल की फिल्म देख रहे है और हीरो इमोशनल हो कर आंसू बहा रहा है। लेकिन पूरे प्रचार तंत्र में फिल्म के रीमेक होने का जिक्र कहीं नहीं किया गया है। अगर किसी और ने यह फिल्म बना ली होती तो उस पर चोपड़ा कैंप की ओर से मुकदमा ठोक दिया गया होता। लेकिन यह जौहर और चोपड़ा कैंप की आपसी समझदारी-साझेदारी और दोस्ती का मामला है।
पिता से अब नहीं डरती हीरोइन
यह शोध का विषय है कि बॉलीवुड में कहानियों का वाकई अकाल है या फिर निर्माता-निर्देशकों में साहस का। वे बार-बार पुराने सिक्कों को बाजार में चला कर खुद को सुरक्षित मानते हैं। हम्टी शर्मा (वरुण धवन) और काव्या प्रताप सिंह (आलिया भट्ट) तथा राहुल (शाहरुख खान) और सिमरन (काजोल) की कहानी में कोई फर्क नहीं है।
यह जरूर है कि वक्त और जमाना बदलने के बाद हीरोइन अब पिता की आंखों से नहीं डरती नहीं और ढीठ होने की हद तक उससे जिद करती है कि एक बार हीरो से मिल तो लो। पिता भी अब परंपरावादी नहीं है क्योंकि खुद उसने प्रेम विवाह किया था। आखिरकार वह हीरो से न केवल मुलाकात करके बात करता है, बल्कि उसके साथ मिल कर शराब और सिगरेट तक पीता है। अतः वह तनाव नई कहानी में मौजूद नहीं रहता, जो मूल कथा में था। यानी आप बहुत रिलेक्स होकर फिल्म को देख सकते हैं।
बाकी सब ठीक ठाक है
निर्देशक ने शुरू से फिल्म को कॉमिक ट्रेक पर रखा है। अगर आप कहानी को भूल कर सिर्फ दृश्यों पर जाएं तो फिल्म आपको बोर नहीं करेगी। बल्कि कुछ जगहों पर गुदगुदाएगी भी। इस सबके बीच जरूरी है कि आप किसी भी तरह से अपना लॉजिक इस्तेमाल न करें। फिल्म की आधुनिकता यह है कि लड़की दबा के बीयर पीती है, टल्ली होती है और लड़का भावी ससुर के सामने धड़ल्ले से धुएं के छल्ले बनाता है।
प्यार की पहली स्वीकृति होते ही आप लड़का-लड़की को चुंबन समेत एक लंबे दृश्य में बिस्तर में देख सकते हैं। अगर आप ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ दीवाने हैं तो आपको लगता है कि अच्छा हुआ कि सिमरन के पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे! ईश्वर उनकी आत्मा को ‘हम्टी शर्मा की दुल्हनिया’ से बचाए। हो सकता है कि फिल्म आपको हॉल में कुछ देर का मजा दे, मगर बाद में विचार करने पर लगता है कि मनोरंजन कितना क्षणिक और सस्ता हो चुका है! लेकिन विचार करने की फुर्सत किसके पास है और अगर विचार करें भी क्यों, किसके लिए? सब कुछ सुधारने का ठेका क्या आपने ले रखा है?
आलिया हो चलीं बोल्ड
आलिया भट्ट की यह चौथी ही फिल्म है, लेकिन उन्हें देखते हुए साफ लगता है कि वह दिन पर दिन बोल्ड होती जा रही हैं। स्टूडेंट ऑफ द ईयर, हाइवे, 2 स्टेट्स तक तो वह आम तौर पर किसिंग सीन तक ही बढ़ी थीं, लेकिन इस फिल्म में उन्होंने बेड सीन भी किया है। वह काफी मुखर और सहज लगी हैं।
उनकी ऐक्टिंग अच्छी है और बिंदास रोल में वह ज्यादा खूबसूरत दिखती हैं। जहां तक वरुण धवन की बात है तो उन्होंने अपना रोल अच्छे से निभाया है, परंतु मुश्किल यह है कि वह न तो शाहरुख बन सकते हैं और न ही गोविंदा। इस फिल्म के माध्यम से सिद्धार्थ शुक्ला ने टीवी से सिनेमा में कदम रखा है, लेकिन वह यहां भी टीवी ऐक्टर की तरह ही दिखे हैं। जबकि आशुतोष राणा ने अपनी छवि के अनुकूल काम किया है।