आपने इस फिल्म से जितनी उम्मीदें लगाई हों, उन्हें सबसे पहले आधी कर लीजिए। इसके बाद भी आपका मन हो तो जरूर सिनेमाघर की गलियों में निकल जाइए। ‘एक विलेन’ के रास्ते में आपको कैमरे की खूबसूरती तो मिलेगी, लेकिन कहानी का रोमांस और रोमांच निराश करेगा। यानी तकनीक का मामला तो एकदम फिट है, लेकिन रचनात्मकता ढीली है। सिद्धार्थ और श्रद्धा जैसे युवा ऐक्टरों की ऊर्जा और ताजगी के बीच निर्देशक और लेखक की शिथिलता फिल्म को कमजोर बनाती है। ‘एक विलेन’ का मूल संदेश हैः अंधेरे को गहरे अंधेरे से दूर नहीं किया जा सका, बल्कि इसे रोशनी से ही भगाया जा सकता है। नफरत को नफरत नहीं मिटा सकती, इसे प्यार से जीता जाता है। इसके बावजूद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि लोहा ही लोहे को काटता है! फिल्म में एक विलेन ही दूसरे विलेन को ठिकाने लगता है।
कहानी में कोई राज नहीं
आजकल की फिल्में लगातार मुख्य पात्रों के चरित्र का खाका ऐसे खींचती हैं कि आप खलनायक में भी खलनायक को न ढूंढ सकें। उनमें हीरो वाली बात आपको नजर आए। ऐसा ही ‘एक विलेन’ में भी है। किसी राजनेतानुमा गुंडे के लिए काम करने वाला गुरु (सिद्धार्थ) अब बदल गया है। उसकी जिंदगी में प्यार आया है। एक अनजान बीमारी से ग्रस्त होकर मौत की तरफ बढ़ रही आयशा (श्रद्धा) से प्यार और शादी के बाद उसे नौ से पांच की नौकरी मिल गई है। गुरु जब यह खुशखबरी श्रद्धा को फोन पर सुना रहा होता है कि तभी श्रद्धा पर कोई हमला करता है और उसकी हत्या कर देता है! किसने यह हत्या की और क्यों? यह राज ज्यादा देर तक राज नहीं रहता और आप जान जाते हैं कि ‘साइको किलर’ राकेश महाडकर (रितेश) ने आयशा की जान ली है!
सनकी हत्यारा और आयशा की मौत
‘एक विलेन’ की कहानी में अगर किसी किरदार के चरित्र का स्पष्ट खाका नजर आता है तो वह है राकेश महाडकर। यह एक ऐसा आदमी है जिसकी पत्नी उसे हमेशा दुत्कारती रहती है क्योंकि इससे शादी करके उसकी जिंदगी खराब हो गई। उसके सपने मर गए। लेकिन राकेश अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता है। उसकी दुत्कार पर उसे गुस्सा तो आता है, मगर वह पी जाता है। धीरे-धीरे उसका यह गुस्सा एक ग्रंथी में तब्दील हो जाता है और वह अपने संपर्क में आने वाली ऐसी महिलाओं की हत्या करने लगता है जो उससे ऊंची आवाज में बात करती हैं। उसे डांटती-फटकारती हैं। राकेश एक लैंडलाइन टेलीफोन कंपनी में है और जिस-जिस घर में वह जाता है, वहां उसका सामना ऐसी औरतों से होता है जो फोन खराब होने के कारण नाराज हैं और उसे खरी-खोरी सुनाती हैं। उनकी आवाजों में राकेश को अपनी पत्नी के ताने सुनाई देते हैं और वह इन महिलाओं की हत्या करता चलता है। आयशा ने भी एक बार सड़क से गुजरते हुए राकेश को दो-चार बातें सुनाई थी। नतीजे में उसे मिली मौत...!!
कहानी भी एक विलेन है
फिल्म की एक बड़ी विलेन इसकी कहानी है। यह पूरी तरह से नकारात्मक ऊर्जा से भरी है। इसके अलावा आयशा के अतिरिक्त इसमें आने वाले पात्र खास आकर्षक नहीं हैं। गुस्सैल गुंडे जैसे हीरो को हीरोइन साध तो लेती है, लेकिन दोनों के बीच रोमांस पर्दे पर निखर कर नहीं आता। इसी तरह से सीरियल किलर की कहानी भी इतनी सपाट है कि उसके राज खुलते ही उसमें कोई रोमांच बाकी नहीं रह जाता। इंटरवेल में गुरु हत्यारे राकेश को पकड़ लेता और पीट-पीट कर अधमरा कर देता है। उसे इलाज के लिए पैसे देते हुए कहता है कि उसके ठीक होने के बाद फिर ऐसे ही मारेगा। पूरी जिंदगी यही चलता रहेगा। कहानी की एक बड़ी कमी यह है कि इसमें बार बार जिक्र आता है कि हीरोइन मरने वाली है। उसे जानलेवा बीमारी है। परंतु आश्चर्यजनक ढंग से वह ठीक हो जाती है। प्रेग्नेंट हो जाती है। आप सोचते रह जाते हैं और कभी यह पता नहीं चलता कि आखिर हीरोइन को क्या बीमारी थी, जो चमत्कारी ढंग से ठीक हो गई!! फिल्म में कई दृश्यों का दोहराव है। यह कमजोरी स्क्रिप्ट की है।
...और अंत में
फिल्म आपके कीमती दो घंटे नौ मिनट लेती है, लेकिन इतने पूरे वक्त बांध कर रखती है यह कहना गलत होगा। मोहित सूरी ने भट्ट कैंप के बाहर पहली फिल्म बनाई है, लेकिन उन पर अपने स्कूल की छाप है। परंतु उस स्कूल की शिद्दत यहां गायब है। फिल्म में ऐक्टरों का काम अच्छा है। ‘आशिकी 2’ के बाद श्रद्धा एक बार फिर खूबसूरत दिखी हैं और उनका अभियन भी अच्छा है। यही बात सिद्धार्थ के बारे में कही जा सकती है। वे पहली बार रोमांटिक फ्रेम से बाहर आए हैं। उनकी फैन लड़कियों की संख्या इस फिल्म के बाद और बढ़ सकती है। रितेश देशमुख दस साल से अधिक के कैरियर में पहली बार नकारात्मक किरदार में हैं और प्रभावित करते हैं। इस साल के ‘बेस्ट विलेन’ पुरस्कारों की सूची में उनका नाम बड़ा दावेदार रहेगा। कुल मिला कर यह फिल्म इन कलाकारों के लिए ही देखे जाने योग्य है।