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पढ़िए, आलिया भट्ट की चर्चित फिल्म 'हाइवे' की समीक्षा

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नाम में धोखे भी छुपे होते हैं। ‘हाइवे’ देख कर आप यह बखूबी समझ सकते हैं। निर्देशक का जितना बड़ा नाम, फिल्म देख कर उतनी बड़ी निराशा। आप ही लिखें और आप ही पढ़ें वाला अंदाज। ‘हाइवे’ इम्तियाज अली का एकालाप है। यह फिल्म अगर बॉक्स ऑफिस और दर्शकों के लिए नहीं है तो निर्देशक इसे अपनी उपलब्धि मान सकते हैं।
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‘हाइवे’ न बॉक्स ऑफिस के पैमाने पर हिट है और न ही दर्शक के पैमाने पर फिट। बहुत सारी फिल्में ‘जीरो एंटरटेनर’ होती हैं। ‘हाइवे’ भी एक उदाहरण है। जिंदगी से अघाए, ऊबे और थके लोगों को इसमें कुछ फंतासी, कुछ थ्रिल और कुछ दर्शन नजर आ सकता है। लेकिन जिनके सामने जिंदगी का हाइवे लंबी दौड़ लगाने के लिए खुला है, उन्हें फिल्म में कुछ हाथ नहीं लगने वाला।

बैंड बाजा बारात और अपहरण

सोलह-अठारह साल की दिखने वाली लड़की की शादी की तैयारियों से शुरू होने वाली फिल्म पहले ही दृश्य में झटका देती है। बेहद अमीर घर और रसूखदार पिता की कमसिन लड़की, जिसके सामने कैरियर की अनंत संभावनाएं हो सकती है प्रेम विवाह के मंडप में बैठने जा रही है! फिल्म इसी लड़की वीरा त्रिपाठी की कहानी है, जिसका शादी से ऐन पहले तब अपहरण कर लिया गया।

जब वह लगभग आधी रात को अपने बॉयफ्रेंड के साथ कार में हाइवे पर हवाखोरी के लिए निकली। थोड़े विरोध और थोड़े सफर के बाद लड़की को महसूस होता है जिस आदमी ने उसे उठाया है वह उसके घरवालों से कहीं बेहतर इंसान है। जबकि वह तीन मर्डर कर चुका है और उसे किसी रेड लाइट इलाके में बेच देना चाहता है। अब इस मुद्दे पर ऐसी चौपाल लग सकती है कि फिल्म खत्म हो जाए, मगर चर्चा चलती रहें।

दर्शन की दुकान में पिकनिक का सामान

जिनका शहरी जिंदगी से मन उचट गया है, इम्तियाज ने उन्हें दर्शन ज्ञान दिया है। लंबे सफर पर निकलें। सैर की सैर हो जाएगी और पिकनिक भी। अगर कोई आपका अपहरण करके ट्रक में सैर करा दे तो और भी बढ़िया। आप होटल के कमरों में कैद नहीं रहेंगे। एक थ्रिल बना रहेगा। खर्चा पानी भी बचेगा। फिल्म की नायिका को जीवन में इतना मिला है कि वह कहीं दूर पहाड़ों पर घर बना कर रहना चाहती है, जहां उसका पति भेड़ें चराता हो।

चूंकि लेखक-निर्देशक को इस मोड़ पर नायिका को सही साबित करने और घर-परिवार-समाज को कोसने के लिए कुछ चाहिए था, इसलिए उसने बताया कि लड़कियों को घर से बाहर ही सावधान रहने की नहीं घर में भी सतर्क रहने की सीख दी जानी चाहिए। चारदीवारों के अंदर ‘उत्पीड़न’ इतना है कि पिता और भाई भी भरोसे के लायक नहीं बचे। आप समझ सकते हैं कि इस तरह से कहानी में सेक्स का तड़का लग गया और सिनेमा की दुकान में सेक्स तो बिकता ही है।

चलती है गाड़ी उड़ती है धूल

‘हाइवे’ पर इम्तिजाय की इस दार्शनिक गाड़ी के पीछे चलना मतलब अपने आपको बेवजह धूल-धुएं से सराबोर करना है। हालांकि उन्होंने सफर को रंगीन बनाने के लिए दिल्ली से निकल कर राजस्थान, पंजाब, हिमाचल और कश्मीर में फिल्म की शूटिंग की है। लेकिन अगर साथ अच्छा न हो तो खूबसूरत से खूबसूरत सफर भी तकलीफदेह बन जाता है।

रणदीप हूडा के चेहरे पर पूरी फिल्म में एक ही तनावपूर्ण भाव रहता है और आप वह उनकी पिछली कई फिल्मों देख चुके हैं। आलिया भट्ट की एकमात्र उपलब्धि उनका नकचढ़ा सौंदर्य हैं। उनके मुंह से निर्देशक ने जिस तरह की बातें कहलवाई है वह सचमुच छोटा मुंह बड़ी बात जैसी हैं। आलिया ने अगर अपनी उम्र को ध्यान में रखते हुए रोल नहीं चुने तो उनका कैरियर हाइवे पर तो बढ़ने से रहा।
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फिर न हो ऐसी मुलाकात

आप चकित होते हैं कि यह फिल्म ‘जब वी मेट’ के निर्देशक ने बनाई है। इम्तियाज से प्यार बनाए रखने के लिए जरूरी है कि एक बार फिर उनकी वही फिल्म देख ली जाए। इम्तियाज के दिए ‘हाइवे’ नाम के दर्द की दवा उन्हीं की ‘जब वी मेट’ है। संगीतकार एआर रहमान के बारे में कहा जा सकता है कि इस फिल्म का संगीत उनकी प्रतिष्ठा में कुछ नया नहीं जोड़ता।

फिल्म में रोमांस नहीं है। एक्शन नहीं है। ड्रामा नहीं है। इमोशंस नहीं हैं। फिर एंटरटेनमेंट कैसे हो सकता है? अक्सर सफर खत्म होने के बाद मुसाफिर इस उम्मीद के साथ एक-दूसरे से विदा लेते हैं कि फिर मिलेंगे। लेकिन यह फिल्म देखते हुए आपको लगता है कि निर्देशक से अगली मुलाकात जब हो तो कम से कम इस तरह नहीं।

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