अगर कोई बांग्लादेश में किसी का कत्ल करके यहां भाग आए तो क्या उसकी ये उम्मीद ठीक है कि हमारा सिस्टम उसे बचा लेगा? उसे पालेगा-पोसेगा, सिर पर बैठा लेगा? अगर सिस्टम ने ऐसा नहीं किया और यहां उसकी जिंदगी कठिन हुई तो वह सिस्टम से नाराज होकर गुंडा बन जाएगा! फर्जी राशनकार्ड से वैध नागरिक बन जाएगा। निर्देशक अली अब्बास जफर की फिल्म ‘गुंडे’ अपने मूल विचार में ही गलत है।
बांग्लादेशी शरणार्थियों के साथ उनकी संदिग्ध संवेदनाओं को अगर सही मानें तो वे नेता कौन से गलत हैं जो इन्हें लेकर वर्षों से वोट की रोटी सेंकते आए हैं? जफर की पॉलिटिक्स गलत है और उसकी फिल्म बेकार। कहने को उन्होंने 1970-80 के दशक का सिनेमा पर्दे पर उतारा है, लेकिन उस सिनेमा में अन्यायी खलनायक हुआ करता था। वह यहां गायब है। जफर भूल गए कि उस जमाने में अगर हीरो सिस्टम से लड़ता था तो वह हमारी जमीन का होता था। अपने लोगों के लिए लड़ता था।
वेलेंटाइन का सिनेमा है या नहीं?
जैसे हर चमकती चीज सोना नहीं होती वैसे ही वेलेंटाइन डे पर रिलीज होने वाली फिल्म वेलेंटाइन के लिए नहीं होती। ‘गुंडे’ प्यार की कहानी नहीं है। दो दोस्त जिस एक लड़की के प्यार में पड़ते हैं, वह पुलिस की अंडरकवर एजेंट निकलती है! दोनों धोखा खाते हैं!! 154 मिनट की फिल्म की शुरुआत बहुत ही कमजोर है। बाला (अर्जुन कपूर) और बिक्रम (रणवीर सिंह) का बचपन सैकड़ों फिल्मों की घिसी हुई कार्बन कॉपी है।
बच्चों पर अत्याचार होता है और वे गुंडे बन जाते हैं। बांग्लादेश बनने के दिनों (1971) में दोनों ढाका के रिफ्यूजी कैंप में रहते हैं और एक मिलिट्री अफसर की हत्या कर रेल में बैठ कलकत्ता आ जाते हैं। यहां वे कोयले की चोरी के धंधे में लग जाते हैं और फिर कलकत्ता के सबसे बड़े गुंडे बन जाते हैं। लेकिन जैसा कि होता है आग को बुझाने के लिए पानी जरूरी है, कलकत्ता में एसीपी सत्यजीत सरकार (इरफान) आता है।
घंटियों की टन टन के बीच नींद
निर्देशक ने यहां बाला और बिक्रम की दोस्ती और दुश्मनी दिखाई है। उनकी दोस्ती का कारण आप समझ न सकें, परंतु दुश्मनी का कारण लड़की होती है! जिसे देखते ही दोनों के दिल की घंटियां बज जाती हैं। वे प्यार में ‘राजेश खन्ना’ बनना चाहते हैं। लेकिन जल्दी ही कहानी में ट्विस्ट और टर्न आते हैं। जो बहुत कमजोर हैं। एक-दूसरे पर जान छिड़कने वाले दोस्त अचानक जान के दुश्मन बन जाते हैं। हिंदी फिल्मों के दर्शकों के लिए इसमें नया कुछ नहीं है।
फिल्म का यह हिस्सा बेहद उबाऊ है और आप बीच में अच्छी खासी नींद भी निकाल सकते हैं। फिल्म के इस हिस्से में अर्जुन कपूर और रणवीर के हिस्से बहुत ही ऊट-पटांग अदाकारी करने का काम आया है और उन्होंने इसे निभाया भी है! फिल्म में मौलिकता गायब है। इसका एक कारण यह भी है कि यह बीते जमाने की कहानी कह रही है और उस जमाने की बहुत अच्छी-अच्छी फिल्में आप पहले ही देख चुके हैं।
डायरेक्टर आखिर क्या चाहता है
अर्जुन कपूर के मुंह से एक पिटी-पिटाई फिलॉसफी कहलवाई गई है, ‘ये जिंदगी मुझसे चाहती क्या है... जब जब इंसान बनने की कोशिश करता हूं, मुंह पर कालिख पोत देती है।’ दर्शक को समझ नहीं पड़ता कि आखिर डायरेक्टर उनसे चाहता क्या है? सिर्फ उसका पैसा!! इसीलिए बिना किसी इतिहासबोध और राजनीतिक चेतना के एक कहानी को उसने कलकत्ता जैसे ऐतिहासिक महानगर की छाया में खड़ा कर दिया। फिल्म पर निर्देशक की पकड़ ढीली है और कहानी सुस्त है। आप बेचैन होने लगते हैं।
कहानी और संवाद भी अली अब्बास जफर के ही हैं। लेखक के रूप में आपको उनके पास शब्दों की कमी भी नजर आती है क्योंकि ‘तेवर’ शब्द का इस्तेमाल फिल्म में दर्जन भर बार जोर देकर किया गया है। ‘तेवर’ वाले दो संवाद तो यही हैः ‘अबे ये तेवर हमारे खून में है तेरे भौंकने से कुछ नहीं होगा।’ और ‘हो तो आप वर्दी वाले पर आपके तेवर हैं गुंडों वाले।’ एक बात और... जफर ने जहां-जहां हिंसा दिखाई, उन दृश्यों में कबूतर जरूर उड़ाए हैं!!
गुंडे, अंडे और डंडे
फिल्म में रणवीर सिंह और अर्जुन कपूर कुछ नया करते नहीं दिखे। वैसे अभी उनके सामने लंबा कैरियर है। जबकि इरफान के द्वारा इस रोल का चुनाव केवल एक बड़े बैनर से जुड़ने का बहाना मात्र लगता है। यहां उनका अंदाज तो कायम है, लेकिन यह रोल उनके प्रशंसकों के लिए याद रखने जैसा नहीं है। प्रियंका सुंदर दिखी हैं। परंतु उनके किरदार को पुलिस से रोती हुई प्रेमिका में तब्दील कर कमजोर कर दिया गया है।
हद तो तब हो जाती है जब अंडरकवर पुलिस ऑफिसर नंदिता सेनगुप्ता बनी प्रियंका का गुंडों पर दिल आ जाता है। वह कहती हैः इनके काले रंग के पीछे मासूम दिल है। ये बच्चे हैं। हालात के मारे हैं। आश्चर्य यह कि पूरी फिल्म में दोनों कहीं ऐसा काम करते नहीं दिखते कि मासूम लगें! बच्चे लगें! जहां तक हालात का सवाल है तो फिर सारे हालात के मारों ने यही करना चाहिए जो यहां बिक्रम और बाला कर रहे हैं। गुंडे की तुक अंडे और डंडे से खूब मिलती है। कई बार तो आपका मन इनका इस्तेमाल करने का होने लगता है।