कुछ सपने सोने नहीं देते। अमोल गुप्ते की यह फिल्म ऐसे ही एक सपने की कहानी है। मुंबई की गरीब चाल में रहने वाला अर्जुन हरिश्चंद्र वाघमारे (पार्थो) अपने पिता की मृत्यु के बाद बचपन में ही बड़ा हो जाता है।
मां, दादी और छोटे भाई वाले परिवार को संभालने के लिए वह एक चाय की दुकान पर काम करना शुरू कर देता है और वहीं उसकी मुलाकात होती है अपने सपने से। स्केटिंग का सपना।
शाम के वक्त उस खाली जगह पर स्केटिंग कोच भार्गव (साकिब सलीम) बच्चों को स्केटिंग सिखाता है और अर्जुन के मन में भी चैंपियन बनने की चाह पैदा हो जाती है। इसके आगे की कहानी आप समझ सकते हैं।
‘स्टेनली का डब्बा’ के बाद अमोल गुप्ते ने संवेदना से भरी यह फिल्म बनाई है जो पहले ही दृश्य से आपके मन को छूती है। फिल्म में अमोल ने बिना कोई शब्द कहे वह बातें कह दी हैं, जो आपको अपने आस-पास के उन बच्चों की जिंदगी से जोड़ देती है जो सुबह उठते ही रोजी-रोटी के फेर पड़ जाते हैं।
जो कहते हैं कि अगर स्कूल जाएंगे तो खाएंगे क्या... किताबें? साथ ही फिल्म में बच्चों की दोस्ती का भी अनूठा रंग देखने को मिलता है। अमोल फिल्म की कहानी को स्थापित करने से पहले एक गीत में एक समाज में दो अलग-अलग जिंदगियां जी रहे बच्चों के सच आपके सामने रख देते हैं।
एक तरफ बच्चों को प्यार मिल रहा है, वे स्कूल जा रहे हैं, मौज मस्ती कर रहे हैं... और दूसरी तरफ बच्चे हैं जो सड़कों पर अपनी सांसों के लिए तिनका-तिनका जुगाड़ करते भटक रहे हैं।
अमोल बच्चों को बराबर मौके दिए जाने की बात करते हैं। प्रतिभाएं छुपी हुई हैं... सिर्फ मौका मिलने की बात है। फिल्म की कहानी में आपको बांधे रखने वाले तमाम-उतार चढ़ाव हैं और सभी कलाकारों ने अच्छा काम किया है।
निर्देशक ने भार्गव के जीवन में लवस्टोरी की झलक दिखाई है लेकिन उसे कहानी पर हावी नहीं होने दिया है। फिल्म को खूबसूरती से शूट किया गया है और इन गर्मियों के बच्चों के अनुकूल फिल्म है। इसे बड़े भी देख सकते हैं क्योंकि इसके बाद वे अपने बच्चों को कुछ और बातें समझा सकेंगे।