ये है बकरापुर की विषय रोचक है। यह फिल्म जितनी एक बकरे की है उतनी शाहरुख की भी। भले ही फिल्म में शाहरुख न हों।
फिल्म देख कर आप यह नहीं कह सकते हैं कि डायरेक्टर ने आपको ‘बकरा’ बना दिया। भले ही बकरे का नाम शाहरुख क्यों हो। ‘ये है बकरापुर’ आम फिल्मों से अलग और देखने योग्य है। हालांकि इसके कथानक की अपनी सीमाएं हैं और फिल्म की रफ्तार पहले हिस्से में थोड़ी सुस्त है।
एक गांव का कुरैशी परिवार फाके के दिन देख रहा है और उस पर कर्ज भी है। कर्ज उतारने और घर में खाने का सामान लाने के लिए आखिरी उपाय है कि ‘शाहरुख’ को अच्छी कीमत पर बेच दिया जाए। लेकिन घर का सबसे नन्हा बालक ‘शाहरुख’ से बहुत प्यार करता है और उसे परिवार का फैसला मंजूर नहीं है।
ऐसे में उसे अपनी बहन के प्रेमी जाफर (अंशुमान झा) का सहारा मिलता है। शहर से हेयर स्टाइलिस्ट बन कर आया जाफर शाहरुख को बिकने से तो बचा लेता है, लेकिन उसका आइडिया हर किसी के लिए शाहरुख खो बहुत कीमती बना देता है। इतना कीमती की कारपोरेट जगत तक उसे एक ब्रांड की तरह देखने लगता है। विदेश तक उसकी ख्याति पहुंच जाती है।
जानकी विश्वनाथन ने उस भारत की तस्वीर पेश करन की कोशिश की है जो धर्मनिरपेक्ष है, मगर उसे छोटी-छोटी बातों में सांप्रदायिक पगडंडियों पर धकेल दिया जाता है। कहानी क्षुद्र सोच और राजनीति एक तंज की तरह है। आप देखते हैं कि कैसे एक बकरे के लिए गांव में तनाव पैदा हो जाता है। सौहार्द्र दांव पर लग जाता है।
फिल्म में अंशुमान झा प्रभावित करते हैं। हाल के दिनों में इस तरह की छोटे बजट की कम चर्चित फिल्मों ने थियेटरों में जगह पाई है और यह सिनेमा तथा दर्शकों की रुचि के एक कदम आगे बढ़ने की निशानी है।
विदेशी फिल्मों की नकल और ग्लैमर से भरे नकली सपनों वाले सिनेमा से इतर यह शुद्ध भारतीय जमीन से जुड़ी हुई फिल्में हैं। हालांकि इन्हें मुकम्मल जगह बनाने से पहले अभी लंबा सफर तय करना है क्योंकि इस तरह की वही फिल्में थियेटरों तक पहुंच रही हैं, जो विदेशी फिल्म समारोहों में सराही जाती है। जो फिल्में वहां नहीं जा पातीं, उन्हें अब भी थियेटर नहीं मिलते।