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हंसी तो फंसीः साड़ी के साथ मिलेगा ब्लाउज भी

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चाइना के माल की भले ही गारंटी न हो, लेकिन चाइना रिटर्न हीरोइन हीरो को गारंटी देती है कि एक बार अगर वह उससे प्यार का इकरार कर ले तो वह सदा के लिए उसकी रहेगी! जबकि हीरो कनफ्यूज है क्योंकि वह हीरोइन की बहन से प्यार करता है।
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जो सात साल में कम से कम सात सौ बार ब्रेक-अप की धमकी दे चुकी है। हीरो दोनों के बीच फंसा है। हालात पर दर्शकों को तो हंसी आती है लेकिन हीरो का चेहरा सदा उतरा हुआ रहता है। आखिर में जब हीरो के दिमाग के जाले साफ होते हैं तो वह हंसता है और फंसता है। हालांकि फिल्म का नाम हंसी तो फंसी है!!

बिना ब्लाउज पीस के साड़ी नहीं बेचते

142 मिनट की इस फिल्म में निर्देशक विनिल मैथ्यू ने पूरा ध्यान रखा है कि साड़ी के साथ ब्लाउज सही ढंग से बिक जाए यानी इमोशन और कॉमेडी का संतुलन बना रहे। इधर की हर फिल्म बताती है कि आज का युवा प्यार के मामले में घनचक्कर है। दुनिया के तमाम दरवाजे खुल चुके हैं।

आवाजाही बढ़ चुकी है। इससे युवा के दिमाग में एक सनसनी चलती रहती है। बदन में गुदगुदी बनी रहती है। युवा के पास कैरियर और प्यार दोनों में ‘चॉइस’ है। जॉब और प्यार में कमिटमेंट को लेकर कमी क्या चुनाव की इसी आजादी से पैदा हुई है? फिल्म में प्यार करने वाले तीनों किरदार डांवाडोल हैं। वे नहीं जानते कि आखिर किससे उन्हें क्या चाहिए?

लूजर कहीं का?

फिल्म का हीरो एक आईपीएस का बेटा निखिल भारद्वाज (सिद्धार्थ मल्होत्रा) हर तरह से लूजर है। न वह अपने मां-बाप की उम्मीदों पर खरा उतर पाता है और न गर्लफ्रेंड की। उसकी गर्लफ्रेंड करिश्मा (अदा शर्मा) का रईस बिजनेसमैन साड़ी किंग पिता नहीं समझ पाता कि आखिर उसकी बेटी ने इस लड़के में क्या देखा?

वैसे खुद करिश्मा के किरदार से आपको पता नहीं चलता कि क्यों वह सिद्धार्थ को प्यार करती है, जो बेरोजगार है! क्या उसके लुक्स के लिए? करिश्मा खुद सफल मॉडल/ऐक्ट्रेस है। क्या उसे अपनी इंडस्ट्री में कोई अपने पैरों पर खड़ा हैंडसम नहीं मिला। फिल्म की स्क्रिप्ट में कुछ झोल हैं और इंटरवेल से पहले कहानी एक जगह पर ठहरी रहती है। जो ऊब पैदा करती है। लेकिन बाद में कहानी रफ्तार पकड़ती है।

ये है वन मैन शो

इस फिल्म में जिस तरह से परिणीति चोपड़ा ने परफॉर्म किया है वह तारीफ के काबिल है। फिल्म को सिर्फ परिणीति के कारण देखा जा सकता है। अपने इंटेलिजेंस के कारण घरवालों द्वारा न समझी जा सकने वाली और घर से भागी लड़की के किरदार में वह जमी हैं। वास्तव में मीता के रूप में परिणीति कहानी की सुस्त रफ्तार और कमियों को पूरी तरह से ढंक लेती हैं।

उनका किरदार यह भी बताता है कि कई बार कुछ लोग अपनी नई, रचनात्मक और अलग सोच के कारण घर में ही कैसे उपेक्षित हो जाते हैं? मीता अपने प्रोजेक्ट को पूरा करने का सपना लिए घर से पैसा चुरा कर भागती है और जब लौटती है, तब भी पैसा चुराने के ही लिए!! वह अपने लक्ष्य में कामयाब हो या ना हो, परिणीति दर्शकों का दिल चुराने में जरूर सफल हैं।

चांस हमेशा सेकेंड लास्ट होता है

यह फिल्म युवाओं को अच्छी लगेगी। खास तौर पर उन्हें जो सोचते हैं कि आस-पास के लोग हमें समझ नहीं पा रहे। जो अपनी धुन में कुछ नया रचना चाहते हैं। फिल्म में उनके लिए संदेश भी है कि कितनी ही नाकामियां मिलें, आगे बढ़ते रहना चाहिए क्योंकि कोई चांस लास्ट नहीं होता। चांस हमेशा सेकेंड लास्ट होता है।

फिल्म में कई मौके हैं जो दर्शकों को गुदगुदाते हैं। अच्छी बात यह है कि कॉमेडी के नाम पर यहां कहीं फूहड़ता नहीं है और इसे परिवार के साथ देखा जा सकता है। परिणीति के साथ सिद्धार्थ ने भी अच्छा काम किया है, लेकिन हीरोइन का किरदार इतना मजबूत है कि ज्यादातर वही असर छोड़ता है। यह फिल्म सिद्धार्थ का सेकेंड लास्ट चांस है।
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एक के बाद आठ जीरो

यह फिल्म इस लिहाज से भी खास है कि पहली बार करन जौहर और अनुराग कश्यप जैसे सिनेमा की अलग-अलग शैलियों वाले निर्माता साथ आए हैं। उन्होंने मिल कर फिल्म बनाई है। करन बॉलीवुड के पारंपरिक सिनेमा को लेकर आगे बढ़ने वाले निर्माता हैं।

जबकि अनुराग की कोशिश नए जमाने में लीक से हट कर सिनेमा बनाने की है। यह संगम भविष्य में बॉक्स ऑफिस पर क्या रंग लाएगा देखना रोचक होगा। पहला प्रयास निस्संदेह उम्मीदें जगाता है। आप एक के बाद आठ जीरो लगा कर हिसाब कर लें।
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