तरक्की... मगर किस कीमत पर? भुतहा फिल्मों में इस समाजशास्त्रीय सवाल का जवाब भुतहा ढंग से ही मिलेगा। ‘रागिनी एमएमएस’ जैसी फिल्म के निर्देशक पवन कृपलानी ने अपनी नई फिल्म में एक मॉल की कहानी दिखाई है।
जहां एक के बाद एक नौ मौतें हो चुकी हैं लेकिन मॉल के मालिक और उसके प्रबंधक इन्हें सिर्फ हादसा मानते हैं। वे नाच-गाने के साथ मॉल को री-लॉन्च करते हैं। यहां नया सिक्योरिटी गार्ड विष्णु (जिमी शेरगिल) आता है, परंतु स्थितियां नहीं बदलतीं।
खास बात यह कि विष्णु का इस जगह से एक संबंध है... क्या है वह? क्या विष्णु के आने से मौतों का सिलसिला थमता है? क्या मॉल सदा के लिए भुतहा रहता है? इन सवालों का फिल्म में जवाब मिलता है।
विकास का तर्क यह कि कोई उजड़ेगा तो कोई बसेगा। ‘डर एट द मॉल’ की कहानी इन्हीं तत्व को लेकर बुनी गई है। हॉरर फिल्मों में जिन्हें मजा आता है, वह ‘डर’ का भी मजा ले पाएंगे। लेकिन जो रोमांच और डरने-डराने के नए अंदाज ढूंढने के लिए चुनिंदा फिल्में देखते हैं, वे निराश होंगे।
फिल्म थोड़ा बांधती जरूर है, मगर इसकी कहानी का दायरा बंधा-बंधाया है। फिल्मी फार्मूले बताते हैं कि एक भुतहा जगह पर कुछ लोग फंस जाएं तो एक के बाद एक मौत तो होगी ही।
डर का रोमांच बढ़ाने के लिए दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे खींचे नजर आते हैं। फिल्म का पूरा भार जिमी शेरगिल के कंधों पर है और उन्होंने अपना काम बखूबी किया है। बाकी कलाकार भी उन्हें मदद करते हैं।