फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्रीचर 3डी के डर से सहम सकते हैं आप

विज्ञापन
विज्ञापन
यह अलग किस्म का हॉरर है। हॉरर, जिसमें एडवेंचर है। ठीक वैसे कि जैसे जंगल से जा रहे हों और सामने शेर आ जाए! निर्देशक विक्रम भट्ट की 3डी फिल्म ‘क्रीचर’ में शेर नहीं, बल्कि ब्रह्मराक्षस आता है। विक्रम ने पुराण और लोक कथाओं में दर्ज इस राक्षस को अपनी कल्पना का जामा पहना कर पर्दे पर उतारा है।
विज्ञापन


उसकी खूबी ‘3डी’ होने में है। वह क्रूर है। क्रोध उसका स्थायी भाव है। उसमें कोई भावना नहीं है। हत्या एकमात्र कर्म है। वह डराता है, भगाता है, जान लेता है। वह शक्ति, ऊर्जा और रफ्तार का पावरहाउस है। वह इंसानों को मार कर जितना खाता है, उसकी भूख उतनी बढ़ती है। उस पर किसी हथियार का असर नहीं होता। तब उससे कैसे पीछा छुड़ाया जा सकता है या मारा जा सकता है? ब्रह्मराक्षस फिल्म का सबसे रोचक किरदार है।

फोकस किया है ब्रह्मराक्षस पर

विक्रम भट्ट ने जितना संभव हो सकता था, उतना ब्रह्मराक्षस पर फोकस किया। लेकिन उन्हें हीरोइन भी दिखानी थी, हीरो भी दिखाना। उनकी ट्विस्ट एंड टर्न से भरी स्टोरी दिखानी थी। अतः बिपाशा बसु और इमरान अब्बास को लेकर भी  उन्होंने कहानी गढ़ी। परंतु इस लवस्टोरी में ‘स्पार्क’ नहीं है। बिपाशा-इमरान का प्यार ठंडा है। जबकि बिपाशा की मौजूदगी में दर्शक इससे विपरीत उम्मीद करते हैं।

फिल्म आहना (बिपाशा बसु) की कहानी है, जो पिता की आत्महत्या से टूट गई है। उसने हिमाचल प्रदेश की ऊंची पहाडियों पर जंगल के बीच एक होटल खोला है। जिसमें सारी पूंजी लगा कर कर्ज तक लिया है। होटल के उद्घाटन के साथ हादसे होने लगते हैं। हनीमून मनाने आए जोड़े में से एक जंगल में मारा जाता है और ब्रह्मराक्षस सामने आता है।
विज्ञापन

बिपाशा का यादगार अभिनय

पता चलता है कि सरकारी लोगों ने गांव के पास हाइवे बनाते वक्त वह पीपल का पेड़ काट दिया था, जिससे ब्रह्मराक्षस की बुरी शक्तियां बंधी थीं। अब वह आजाद होकर हत्याएं कर रहा है। जब होटल बंद होने की नौबत आ जाती है तो कमजोर और टूटी-सी आहना ब्रह्मराक्षस से टकराने की ठान लेती है।

बिपाशा ने अपने किरदार को अच्छे से निभाया है, लेकिन अब उन्हें उम्र के मुताबिक रोल ही नहीं बल्कि नायक भी चुनने चाहिए। इमरान उनके साथ नहीं जमते। हालांकि उन्होंने दी गई जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। फिल्म के संगीत में विक्रम की ‘राज’ की धुनें सुनाई पड़ती हैं। परंतु सबसे मधुर गीत सब खत्म हो जाने के बाद अंत में सुनाई पड़ता है।

निर्देशक के रूप में विक्रम ने कल्पनाशीलता दिखाई है। परंतु लेखक के रूप में वह कमजोर हैं। तकनीकी स्तर पर जरूर उनकी फिल्म हॉलीवुड की टक्कर की दिखती है, लेकिन कहानी भी कसावट भरी होती फिल्म ज्यादा बेहतर बनती। इन बातों के बावजूद फिल्म उन दर्शकों के लिए है जो पर्दे पर नए रोमांच की तलाश करते हैं। जिन्हें डरने में मजा आता है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें