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भूतनाथः भूत बताएगा वोट देने के फायदे

Fri, 11 Apr 2014 11:36 AM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
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जनता सो रही है और देश मर रहा है। जनता को कौन जगाएगा और देश को कौन बचाएगा? सिर्फ वोट। जिसकी कीमत जानना सबके लिए जरूरी है। चुनाव के इन दिनों में यह बात मौसमी लग सकती है लेकिन हकीकत है।
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फिल्म ‘भूतनाथ रिटर्न्स’ वोट देने के लिए जागने का आह्वान करती है। घरों से निकलें और वोट करें। यह वोट नेता के लिए नहीं, खुद आपके लिए है। आपके वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाने के लिए।

निर्देशक नीतेश तिवारी की फिल्म का संदेश साफ है। इसकी चुनाव के साथ टाइमिंग जबर्दस्त है। यह फिल्म ‘भूतनाथ’ (2008) का सीक्वल है। जिसकी शुरुआत ‘भूतलैंड’ में होती है। पृथ्वी से यहां पहुंचे लोगों का हिसाब-किताब चल रहा है और वे अगले जन्म की प्रतीक्षा में हैं।
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भूतनाथ (अमिताभ) पर हर कोई हंस रहा है क्योंकि वह यहां आने से पहले कुछ बच्चों को डरा तक नहीं सका! तब भूतनाथ फिर लौटता है कि अब बच्चों को डरा के दिखाएगा। लेकिन धारावी में रहने वाले नन्हें अखरोट (पार्थ) से उलझ जाता है। दोनों की दोस्ती बढ़ती है। गरीब अखरोट भूतनाथ की मदद से मुंबई की उन अंडर कंस्ट्रक्शन विशाल प्रॉपर्टियों को खाली कराता है, जिनमें भूतों के कारण काम ठप है।

इसी बीच ऐसी परिस्थितियां बनती है कि गरीबों-पिछड़ों को उनका हक दिलाने के लिए भूतनाथ को चुनाव मैदान में उतरना पड़ता है। उसका मुकाबला है धारावी से दो बार जीत चुके भाऊ (बोमन इरानी) से। फिल्म धीमी शुरुआत के बाद रफ्तार पकड़ती है और थोड़ी यहां-वहां होकर चुनावी ट्रेक पर आ जाती है।

चुनाव के बहाने फिल्म में व्यवस्था और लोगों के यथास्थितिवादी होने पर भी टिप्पणियां हैं। फिल्म का अंदाज कॉमिक और व्यंग्यात्मक है। अमिताभ में आज भी अकेले ही फिल्म को खींचने का दमखम है। नन्हें पार्थ भालेराव ने उनका अच्छा साथ दिया है। बोमन रोचक लगे हैं, लेकिन उनका अंदाज अब देखा-देखा सा लगता है। वह गुंडे-नेता के रूप में ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ की याद दिलाते हैं।

मेहमान कलाकार के रूप में यहां शाहरुख खान, रणबीर कपूर और अनुराग कश्यप हैं। तीनों की मौजूदगी फिल्म में कुछ जोड़ती नहीं है। कश्यप के लिए लिखा गया दृश्य ‘चमचागिरी’ मालूम पड़ता है। इस तरह से नितिन खुद अपनी गंभीरता को हल्का बना लेते हैं।

155 मिनिट की इस फिल्म में कुछ कसावट की दरकार थी। इन बातों के बावजूद फिल्म का महत्व कम नहीं होता। अमिताभ के प्रशंसकों और चुनावी बयार का आनंद ले रहे लोगों को यह फिल्म अच्छी लगेगी। बाकी लोग अपने वोट की तरह अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकते हैं।
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