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ओ तेरीः घोटालों की कॉमेडी देखना चाहेंगे?

Sat, 29 Mar 2014 08:59 AM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
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निर्माता-निर्देशक यह बताने में गर्व महसूस करते हैं कि उन्होंने वह फिल्म बनाई है जिसे देखने के लिए जरा भी दिमाग नहीं लगाना पड़ेगा। लेकिन आप पाते हैं कि ऐसे ज्यादातर लोगों ने फिल्म बनाते वक्त भी दिमाग लगाने की खास जरूरत नहीं महसूस की।
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वास्तव में जब किसी कहानी की नींव ही मौलिक आइडिये पर न रखी गई हो तो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है! फिल्म ‘ओ तेरी’ से भी मौलिकता की आशा न रखें। इसकी नींव हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाने वाली ‘जाने भी दो यारो’ (1983) पर रखी गई है।

उस फिल्म में दो फोटोग्राफर मित्र थे, जिन्हें ‘खबरदार’ अखबार ने रईस और रसूखदार लोगों की जिंदगी के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने के लिए सुबूत जुटाने का जिम्मा दिया था। फिल्म में राजनीति, अफसरशाही, मीडिया और व्यवसाय जगत का गंदा गठजोड़ दिखा था। जिसमें एक लाश शुरू से अंत तक अहम किरदार में थी।
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निर्देशक कुंदन शाह की ‘जाने भी दो यारो’ की तर्ज की पर उमेश बिष्ट की ‘ओ तेरी’ में टीवी चैनल का एक रिपोर्टर और एक कैमरामेन है। सनसनीखेज खबर के रूप में वह पहले तो अदरक के गणेशजी ढूंढते हैं और जब नौकरी से हाथ धोने की नौबत आती है तो स्कैम (घोटाले) खोजने निकलते हैं।

इसी दौरान एक लाश उनकी कार में आ जाती है। फिल्म में दिल्ली में 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों की तर्ज पर एशियन ओलंपिक्स होने वाले हैं। कैसे इन खेलों में राजनेता, ब्यूक्रेसी, मीडिया और बिजनेसमेन मिल कर घोटाले करते हैं, नोट बनाते हैं और कैसे उनके काले कारनामों से पर्दा उठता है, यह फिल्म का विषय है।

फिल्म के नायकों पीपी (पुलकित) और एड्स (बिलाल) के हाथ बार-बार सबूत लगते हैं और फिसल जाते हैं।

कुछेक दृश्यों को छोड़ दें तो फिल्म अपनी किस्सागोई में कतई आकर्षित नहीं करती। ऐक्टर और गीत-संगीत भी प्रभावित नहीं करते। निर्देशन फिल्म की कमजोर कड़ी है।

डायलॉगों का स्तर इन दो संवादों से आप खुद तय कर सकते हैः पहला, ‘यार तुझे सेफ्टी का इतना ही शौक था तो जर्नलिस्ट क्यों बन गया, कंडोम की दुकान खोल लेता।’ दूसरा, ‘लोहार को अपने हथौड़े पर और मर्द को अपने घोड़े पर पूरा भरोसा करना चाहिए।’

कुल मिला कर फिल्म निराश करती है। यहां उम्मीद की केवल एक किरण है, पुलकित सम्राट। वह अच्छे ऐक्टर हैं और उनमें युवा सलमान खान की झलक दिखाई देती है।

लेकिन टिकाऊ कैरियर के लिए उन्हें दिमाग से फिल्मों का चुनाव करना होगा। वर्ना हाथ से मौका निकलने के बाद मुंह से सिर्फ निकलेगा, ओ तेरी...! अंततः यह फिल्म देखने से बेहतर है कि ‘जाने भी दो यारो’ देख ली जाए। भले ही आपने पहले देखी हो या ना देखी हो।
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