क्रिकेट, हॉकी, एथलेटिक्स और बॉक्सिंग पर बनी बॉलीवुड फिल्में आपने देखी हों तो कबड्डी पर बनी फिल्म भी आकर्षित करेगी। कबड्डी में भारत विश्व चैंपियन है। एशियाई खेलों में जब से इस खेल को शामिल किया गया है तब से हम ही स्वर्ण पदक जीत रह हैं। अब मोहल्ले की सरहदों से इसे बाहर निकालने की कोशिशें प्रोफेनल स्तर पर हो रही है।
बदलापुर बॉयज कबड्डी की लोकप्रियता को आगे से जाने का प्रयास है। बदलापुर बॉय्ज विषय के रूप में अच्छी है। इसकी कहानी जमीन से जुड़ी है, मगर इसकी स्क्रिप्ट और निर्देशन सबसे बड़ी कमजोरी है।
अभिनेताओं का रंगरूप खेल और खिलाड़ियों के अनुरूप है, लेकिन अभिनय प्रभावित नहीं करता। पटकथा में प्रेम उपस्थित है, लेकिन उसकी तीव्रता गायब है। कुल मिला कर एक खेल फिल्म को कैसा नहीं होना चाहिए, यह जानने के लिए जरूर बदलापुर बॉय्ज देखी जा सकती है।
फिल्म उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े गांव बदलापुर की कहानी है जहां बरसों से बारिश नहीं हुई और सूखे ने कहर बरपा रखा है। एक व्यक्ति सरकार-प्रशासन को झकझोरने और गांव में नहर लाने की मांग करते हुए आत्मदाह करता है परंतु सब उसे पागल करार देते हैं। उसका चौथी पास बेटा विजय (निशान) गांव के रईस के घर गुलामी करते हुए बड़ा होता है।
वह दूसरे बच्चों की तरह कबड्डी खेलना चाहता है, परंतु रईस ने उसे कसम दिखाई कि वह यह खेल नहीं खेलेगा। बदलापुर की कबड्डी टीम हमेशा हारती है और इसके खिलाड़ियों का कोई सम्मान नहीं है। परंतु यही टीम एक दिन राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में उतरती है और देखते-देखते चैंपियन बन जाती है।
राष्ट्रीय स्तर का कोच (अनु कपूर) टीम की मदद करता है। प्रतियोगिता में जीतने और मुख्यमंत्री का ध्यान बदलापुर की तरफ आकर्षित करने के लिए विजय खेल के मैदान में जान तक गंवा देता है।
फिल्म में कबड्डी के कुछ रोमांचक क्षण जरूर हैं, परंतु फिल्म को बेहतर बनाने में वे पर्याप्त नहीं हैं। मथुरा से आई नायिका के साथ विजय का प्रेम प्रसंग गानों तक सिमटा है। बदलापुर बॉय्ज में एक खेल फिल्म के लिए जरूरी उतार-चढ़ावों का अभाव है।
मेले और बदलापुर की कबड्डी टीम के सदस्यों से जुड़े कई दृश्य बनावटी मालूम पड़ते हैं। ऐसे में यह फिल्म सिनेमा के शौकीनों का मनोरंजन नहीं करेगी। अगर कबड्डी से आपको प्यार है तो इसे देख सकते हैं।