'3जी' एक विज्ञान फंतासी फिल्म है जो अपनी मेकिंग स्टाईल में भुतही होना चाहती है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी फिल्म का कन्फ्यूजन है। फिल्म तय नहीं कर पाती है कि उसे दर्शकों को डराना है, विज्ञान और मोबाइल नेटवर्किंग के जाल में उलझाना है या फिर बेडरुम और किस सीन दिखाने हैं। इससे भी ज्यादा कन्फ्यूजन उस वक्त उन्हें पोनोग्राफी के दुष्परिणामों पर सामाजिक विमर्श करना है।
भुतही फिल्म देखने आए दर्शक वास्तव में डरने की उम्मीद से ही आते हैं। एक तरह का चैलेंज उनके दिमाग में चल रहा होता है कि वह डरेंगे या नहीं। फिल्म का प्लाट ऐसा था जहां इसे एक थ्रिलर भुतही फिल्म बनाया जा सकता था लेकिन यह एक भटकी हुई भ्रमित फिल्म बनकर रह गयी है। भुतही फिल्में आमतौर पर इंटरवल के बाद टाइट होती है। '3 जी' के साथ यह सबसे बड़ा ड्रॉबैक है कि यह फिल्म इंटरवल के बाद एकदम ढीली पड़ जाती है।
सुराग खोजने के लिए एक लिंक से दूसरे लिंक तक पहुंचने की कोशिश गुत्थियों से भरी है। इन उपकथाओं को बताने के लिए जो किरदार पर्दे पर प्रकट होते हैं उन्होंने इतनी घटिया ऐक्टिंग की है कि दर्शकों के लिए उन्हें झेल पाना मुश्किल होता है। सोनल चौहान और नील नीतिन मुकेश रियल लाइफ में कॅपल हैं। इस तथ्य का लाभ फिल्म निर्देशक ने खूब लिया है। कई जुनूनी स्मूच सीन आपको इमरान हाशमी की याद दिला देते हैं।
थ्रीजी फोन में आती है एक ब्लैंक कॉल
सैम (नील नीतिन मुकेश) और सीना (सोनल चौहान) फिजी में छुट्टियां बिता रहे होते हैं। रोमांस के इन्हीं दिनों में सैम का फोन पानी में गिर जाता है। वह एक सेकेंड हैंड थ्रीजी फोन खरीदता है। कहानी यहीं से शुरू होती है। सैम के उस फोन पर अननोन नंबर से कॉल आने शुरू होते हैं। फोन पिक करने पर कभी एक लड़की की सुंदर तो कभी भुतही तस्वीर स्क्रीन पर चमकती है। जब फोन आता है तो उसी के साथ रहस्यमयी घटनाएं भी शुरू होती हैं।
फोन कॉल का असर सैम पर पड़ने लगता है। उसकी ऐक्टिविटी अजीब से होने लगती हैं। वह कभी खुद को तो कभी सीना को मारने की कोशिश करता है। इंटरवल के बाद की कहानी इस बात पर फोकस की गयी है कि फोन पर आने वाली वह लड़की आख्रिर है कौन। सैम और सीना को उस लड़की के बारे में नए-नए रहस्य मिलते हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स ऐसा रखा गया है जहां पर इसका सीक्वल बनाया जा सके।
नील रुटीन लगे, सोनल खराब
नील नीतिन एक जैसा अभिनय करते हैं। यह उनकी कमजोरी है। उनकी अच्छाई यह है कि वह ओवर ऐक्टिंग नहीं करते। यदि कम बोलने वाले किरदार नीतिन के लिए लिखे जाए तो संभव है कि नीतिन उसमें खूबसूरत अभिनय करें। नीतिन ने इस फिल्म में वैसा ही अभिनय किया है जैसे कि पिछली कई फिल्मों में करते आ रहे हैं। यहां कुछ भी नया नहीं।
सोनल चौहान के पास इस फिल्म में ऐक्टिंग का भरपूर मौका था। उनका किरदार लगभग नील जितना ही बड़ा है। बावजूद इसके वह असर नहीं छोड़ पातीं। सोनल का फोकस सुंदर और सेक्सी होने पर ज्यादा है। डर के दृश्यों में भी उनकी ऐक्टिंग प्रभावित नहीं करती। बाकी के किरदारों ने सिर्फ ओवरऐक्टिंग की है।
दो निर्देशक मिलकर भी नहीं संभाल पाए फिल्म
इस फिल्म का निर्देशन शीर्षक आनंद और शांतुन रॉय ने किया है। यह उनकी पहली फिल्म है। फिल्म को लेकर इनका कन्फ्यूजन कदम-कदम पर दिखता है। वह इस बात को लेकर भ्रमित रहे हैं कि फोन पर आने वाले लड़की को किस रूप में दिखाएं। साथ ही फिल्म का क्लाइमेक्स वह कैसे करें। फिल्म में होमवर्क भी कमजोर और अधकचरा रहा है। इंटरवल के बाद वह इतनी उपकथाएं इंट्रोड्यूजस कर देते हैं कि दर्शक समझ नहीं पाते कि वह किस लिंक को पकड़ क्लाइमेक्स से रिलेट करें।
जिस चुड़ैल का चेहरा फिल्म में 20 से अधिक बार दिखाया गया है कि उसका मेकअप बी ग्रेड की किसी भुतही फिल्म जैसा है। उनके निर्देशन में अच्छी बात सिर्फ यह है कि उन्होंने डराने के लिए कुर्सी हिलने, खिड़कियां खड़कने या बिजली चमकने जैसे घिसे-पिटे फॉर्मूलों का प्रयोग नहीं किया। उनकी एक खूबी यह भी कह सकते हैं कि उन्होंने किस और बेडरूम सीन को जुनूनी तरह से फिल्माया है।
देखने के साथ सुन भी सकते हैं गाने
गानों का तो फिल्म में ऐसा है कि जब निर्देशक को लगता है कि काफी देर से किस या बेडरूम सीन नहीं हुआ है तो वह एक गाना टपका देते हैं। फिल्म की क्वॉलिटी की तुलना में फिल्म के गाने अच्छे हैं। "कैसे बताऊं" और "बुलबुलिया" गाने सुनने में ठीक-ठाक हैं। "खलबली" गाना भी अच्छा लगता है।
क्यों देखें
यदि आपको इस बात में रुचि है कि इस फिल्म का नाम '3 जी' क्यों रखा गया है। साथ ही कुछ बेडरूम और किस सीन दिलचस्पी हो तो भी जा सकते हैं।
क्यों न देखें
यदि आप एक मजेदार भुतही या सस्पेंस फिल्म की उम्मीद लेकर जा रहे हों तो।