फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फिल्म समीक्षा: वजीर में अमिताभ बच्चन को छोड़ कुछ भी नया नहीं

Fri, 08 Jan 2016 03:58 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई ब्यूरो
विज्ञापन
विज्ञापन
निर्माताः विधु विनोद चोपड़ा
विज्ञापन

निर्देशकः बिजॉय नांबियार
सितारेः अमिताभ बच्चन, फरहान अख्तर, अदिति राव हैदरी, मानव कौल
रेटिंग**

आपने कभी शतरंज नहीं खेला और इसके नियम न जानते हों तब भी वजीर देखने में अड़चन नहीं आएगी। फिल्म का इस खूबसूरत खेल, इसके नियमों और इसकी चालों से कोई सीधा संबंध नहीं है। यह स्पोर्ट्स फिल्म नहीं है। ऐसे में अगर इसका नाम वजीर न होकर प्यादा भी होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता। निर्माता-निर्देशक ने फिल्म को आकर्षक बनाने के लिए इसमें तमाम डिजाइनों के शतरंज बोर्ड और मोहरे दिखाए हैं।

आप जब उन पर ही ध्यान देते हैं तो सब ठीक लगता है। जैसे ही कहानी और अन्य बातों में उतरते हैं, तिलस्म टूट जाता है। हवा-हवाई कहानी सामने आती है, जिसे हकीकत की जमीन पर खड़ा करने का प्रयास है। एक एटीएस अफसर पत्नी-बच्ची के साथ सुखी जी रहा है। बाजार में अचानक उसे वांटेड आतंकी दिखता है। वह कार लेकर पीछे लग जाता है और फंस जाता है।
विज्ञापन


इस मुठभेड़ में बच्ची मारी जाती है और उसकी जिंदगी बदल जाती है। अफसर की पत्नी उससे दूर हो जाती है। घटनाचक्र बदलता है और अफसर की मुलाकात एक अपाहिज बूढ़े से होती है, जो शतरंज का शौकीन है। बूढ़े का एक अतीत है।

बस व्हीलचेयर पर बैठे अमिताभ प्रभावी हैं

बूढ़े का अतीत यह कि उसकी बेटी को एक मंत्री ने मार दिया था। बूढ़ा बदला चाहता है और शतरंजी चालें चलते हुए इस काम में अफसर का इस्तेमाल करता है। कुल जमा व्हीलचेयर पर बैठे अमिताभ बच्चन के सिवा आप फिल्म में कोई नयापन नहीं पाते। बदले की कहानियां बॉलीवुड के डीएनए में हैं। यह डीएनए मुनीमों, जमीदारों, ठेकेदारों से होते हुए भ्रष्ट नेताओं-अफसरों और आतंकियों तक रूप बदलता रहा है।

निर्देशक नांबियार निराश करते हैं। फिल्म बनाते हुए उन्होंने समय की रफ्तार अपने हिसाब से रच ली है। शुरुआत इतनी तेज कि पहले सीन में हीरो-हीरोइन का निकाह। कट-टू। दूसरे सीन में अस्पताल में संतान उनकी गोद में खेलती है। लेकिन जब अंत में विलेन को ठोकते हुए हीरो को उसका साथी चेतावनी देता है कि यहां से निकलने को केवल तीस सेकेंड हैं तो तीन मिनट का इमोशनल सीन रचा जाता है!
विज्ञापन

इमोशन नहीं, रोमांस भी गायब

यह कहानी सरल रेखा-सी नहीं है। इमोशन भी नहीं हैं। रोमांस गायब है। हंसने का कोई मौका नहीं। ऐक्शन भी उल्लेखनीय नहीं है। सिर्फ तकनीकी रूप से दृश्य सुंदर दिखते हैं। अमिताभ अकेले शख्स हैं जिनके पर्दे पर आने से दृश्यों में जान आती है।

ऐक्टर के रूप फरहान अख्तर ‘मिल्खा’ से कमतर हैं। रोमांटिक वे दिखते नहीं। कॉमेडी कर नहीं सकते। अतः वजीर वह कभी बन नहीं सकेंगे। नील नितिन मुकेश तो प्यादे से भी गए गुजरे हो गए हैं। अदिति राव हैदरी के लिए यहां करने को कुछ नहीं जैसा है। विलेन के रूप में मानव कौल जरूर प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा का सही इस्तेमाल निर्माता-निर्देशक-लेखक ने नहीं किया।

फिल्म अति औसत है। आप नए साल की इससे शुरुआत करना चाहें और अपने चयन में मात खा जाएं, तो जिम्मेदारी आपकी।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें