निर्माताः राजू चड्ढा-अमित कपूर
निर्देशकः प्रवाल रमन
सितारेः रणदीप हूडा, आदिल हुसैन, ऋचा चड्ढा, टिस्का चोपड़ा
रेटिंग **1/2
-अपराध की दुनिया में खास पहचान रखने वाले चार्ल्स सोभराज की जिंदगी के बारे में अगर आप नहीं जानते तो निर्देशक प्रवाल रमन की यह फिल्म मदद करेगी। भारतीय मूल के पिता और वियतनामी मां की संतान सोभराज एक समय दुनिया के सबसे खतरनाक चोर, उचक्कों, हत्यारों में शुमार था।
ड्रग्स के धंधे और लूट से उसकी जिंदगी चलती थी। उसके कई नाम, पहचान और पासपोर्ट थे। 1970-80 के दशक में वह किंवदंती की तरह लोगों की बातों में शुमार था और उसे भी यह मालूम था। इसलिए वह खुद अपनी कहानियां धन लेकर मीडिया को बेचता था।
चार्ल्स पर अलग-अलग देशों में दर्जन भर से ज्यादा हत्याओं के आरोप थे। जिनमें से अधिकतर वे महिलाएं थीं जो उसके आकर्षक व्यक्तित्व में फंस कर उसे दिल दे बैठी थीं। प्रवाल की फिल्म चार्ल्स के व्यक्तित्व के इस पहलू पर खासा प्रकाश डालती है।
‘और जब वह मुझे देखता है, आई फील लाइक हेविंग सेक्स विद हिम’
फिल्म की नायिका पुलिस पूछताछ में कहती है, ‘और जब वह मुझे देखता है, आई फील लाइक हेविंग सेक्स विद हिम।’ वहीं अमेरिका से पढ़ कर लौटी एक भारतीय मनोचिकित्सक चार्ल्स से एक कमरे में कुछ समय अकेले बातचीत के बात पुलिस से कहती है कि उसने गलत व्यक्ति के गिरफ्तार किया है। यह चार्ल्स है ही नहीं।
फिल्म की मूल कथा चार्ल्स के उस दुस्साहस को दिखाने की है जिसमें वह 1986 में दिल्ली के मजबूत तिहाड़ जेल से दिन-दहाड़े फरार हो गया था। उसने अपने जन्मदिन पर सारे कैदियों-पुलिस को ऐसा मीठा खिलाया, जिसमें बेहोशी की दवा मिली थी।
नतीजा यह कि आराम से ताला खोल कर जेल से निकलते चार्ल्स और उसके तीन साथियों को रोकने वाला कोई नहीं था। हालांकि कुछ ही दिनों में सभी फरार अपराधियों को पुलिस ने फिर पकड़ लिया। क्या चार्ल्स ने जानबूझकर जेल तोड़ने और फिर पुलिस की गिरफ्त में आने का यह ड्रामा रचा था?
मनोरंजन के बजाय तथ्यपरक फिल्म को समझना चाहें तो इसे देख सकते हैं
प्रवाल की फिल्म में चार्ल्स के व्यक्तित्व के विभन्न पहलुओं को बारीकी से दिखाने की कोशिश है, लेकिन फिल्मी होने के चक्कर में वह उसकी कुटिल-क्रूर-आपराधिक प्रवृत्ति की तरफ ज्यादा नहीं जाते। सिनेमा अपराधियों को किस तरह ग्लैमर बख्शता है, यह फिल्म उसका उदाहरण है।
लेखक-निर्देशक ने फिल्म को तथ्यात्मक बनाने पर इतना जोर दिया कि यह कुछ जगहों पर डॉक्युड्रामा जैसी महसूस होती है। इसमें अपराध कथाओं वाला थ्रिल प्रभावित होता है। इस कसौटी पर फिल्म खास मनोरंजन नहीं करती।
रणदीप हूडा चार्ल्स के जैसे रंग-ढंग और लहजे में प्रभावित करते हैं। चार्ल्स को अदालत में कड़ी सजा दिलाने वाले पुलिस अधिकारी आमोद कंठ के रोल में आदिल हुसैन जमे हैं। ऋचा चड्ढा यहां मीरा नाम की लड़की हैं जो कानून की पढ़ाई करते हुए चार्ल्स से मिलती है और उसके प्यार में गिरफ्तार हो जाती है।
आदिल की पत्नी के रूप में टिस्का चोपड़ा के हिस्से कुछ रोचक दृश्य आए हैं। कथानक रोचक है, मगर इसके क्रमबद्ध होने के बजाय छलांगें भरने से दर्शक के लिए असुविधाजनक हो जाती है। अगर आप मनोरंजन की उम्मीद के बगैर तथ्यपरक फिल्म को समझना चाहें तो इसे देख सकते हैं।