निर्माताः शैलेष सिंह/सुतपा सिकदर
निर्देशकः निशिकांत कामत
सितारेः इरफान, जिमी शेरगिल, विशेष बंसल, तुषार दलवी, उदय टिकेकर
रेटिंग **
बाज ने झपट कर चूहे को दबोच लिया। कहानी सच्ची है मगर सुन कर दुख होता है। जब चूहा पलट कर बाज पर हमला करता है तो कहानी सच्ची नहीं लगती लेकिन दिल खुश हो जाता है। निशिकांत कामत की मदारी आपको सच्चाई के रास्तों का आभास दिलाती हुई एक ऐसी ही फंतासी दुनिया में ले जाती है। जहां एक आम आदमी पुल गिरने से दब कर मर गए अपने बेटे का बदला लेने के लिए देश के गृहमंत्री के ‘राजकुमार’ का अपहरण कर लेता है। वह सत्ता से न्याय चाहता है कि जिन लोगों की भागीदारी पुल बनाने में रही उन्हें सजा मिले, तुरंत।
ऐसे मामलों में न्याय की रफ्तार कितनी फाइलों और कमेटियों से होकर गुजरती है यह किसी से छुपा नहीं है। वास्तव में फिल्म में आप न्याय होता हुआ नहीं देखते। यह जरूर नजर आता है कि एक रसूखदार का बच्चा गुम जाए तो सत्ता तथा प्रशासन में बैठे लोग कितनी तेजी से सक्रिय हो जाते हैं। जमीन-आसमान एक कर देते हैं। वर्ना तो देश में गरीबों, अभावग्रस्तों और सत्ता संपर्क के लाभ से वंचितों के सैकड़ों बच्चे आए दिन गुमते हैं। उनके अपहरण/खरीद-बिक्री/हत्या तक की पुलिस समय पर रिपोर्ट नहीं लिखती। प्रशासनिक दफ्तरों में इसकी कोई सुनवाई नहीं होती।