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फिल्म समीक्षा/ग्रेट ग्रैंड मस्ती: कुंठाओं से भरा सिनेमा

Fri, 15 Jul 2016 01:45 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
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निर्माता-निर्देशकः इंद्र कुमार
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सितारेः विवेक ओबेराय, रितेश देशमुख, आफताब शिवदासानी, उर्वशी रौतेला
रेटिंग *

पहली फिल्म हिट रहे और सीक्वल 100 करोड़ का कलेक्शन दिखा दे तो तीसरी कड़ी से कमाई का भरोसा कुछ भी करा सकता है। निर्देशक इंद्र कुमार इसी रास्ते पर बढ़े हैं। वह मस्ती तथा ग्रैंड मस्ती के बाद ग्रेट ग्रैंड मस्ती लाए हैं। परंतु यह कॉमेडी के नाम पर कुंठाओं से भरा सिनेमा है। जिसमें लोगों के नाम, छवि, उम्र तक का कोई लिहाज नहीं है।

फिल्म में एक नौकरानी का नाम शाइनी है और वह ऐक्टर शाइनी आहूजा की याद दिलाती है, जो अपने घर में काम करने वाली युवती से रेप के आरोप में जेल हो आए हैं। मामला अभी अदालत में है। यहां फिल्म की नायिका अंग प्रदर्शन करते हुए अश्लील संवाद बोलती है और आपको हिंदी सिनेमा की सबसे खूबसूरत अभिनेत्रियों में से एक रेखा की याद दिलाती है। बेशर्मी की सारी सीमाएं तब टूट जाती हैं जब उम्रदराज, वृद्ध स्त्रियों को भी इस सेक्स कॉमेडी का अंग बना दिया जाता है।
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फिल्म की कहानी फिर से मीत, अमर और प्रेम की निजी जिंदगी की समस्या से शुरू होती है। तीनों के घर के हालात साला, साली और सास की वजह से ऐसे हैं कि पत्नियों के संग उन्हें अंतरंग समय नहीं मिल पा रहा। नतीजा यह कि वह बाहर तलाश शुरू कर देते हैं, जो उन्हें उस पुरानी हवेली में ले जाती है जहां पर गुजरे पचास साल से रागिनी (उर्वशी रौतेला) का भूत रह रहा है।
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तेरे घर में मां-बहन नहीं है क्या

रागिनी की मौत बीस साल की उम्र में हो गई थी मगर उसकी आत्मा का मुक्ति/शांति नहीं मिली क्योंकि उसकी दैहिक कामनाएं अतृप्त रह गई थीं। तीनों दोस्तों के माध्यम से वह अब संतुष्ट होना चाहती है। सेक्स और हॉरर को मिला कर इंद्र कुमार ने जो इंद्रजाल रचने की कोशिश की उसे आप साफ शब्दों में फूहड़ कह सकते हैं।

लिखने और बनाने वालों ने अपनी कुंठाओं को पर्दे पर उतारने में खुद को बे-लिबास कर दिया। तेरे घर में मां-बहन नहीं है क्या... जैसा डायलॉग इन्हीं लोगों के लिए है। फिल्म न तो हंसाती है और न किसी तरह का हॉरर इसमें है। ऐक्टरों ने ऐक्टिंग के नाम पर सस्ती वाली मस्ती की है। फिल्म वक्त की बर्बादी है और इसे देखना अपनी संवेदनाओं का अपमान करना है।

विवेक ओबेराय और रितेश देशमुख स्थापित ऐक्टर हैं। अश्लील हाव-भाव-संवाद उन्हें शोभा नहीं देते। आफताब की मजबूरी समझी जा सकती है कि उन्हें लोकप्रियता के लिए सस्ते हथकंडों की जरूरत है। उर्वशी रौतेला तेजी से आगे बढ़ने के प्रयास में खराब फिल्में चुन रही हैं।

इस साल क्या कूल हैं हम-3 और मस्तीजादे के बाद यह तीसरी फिल्म है तो सिनेमा के तीसरे दर्जे को अव्वल दर्जा दिलाने की कोशिश में दिखती है। मगर फिलहाल यह संभव नहीं।
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