कपूर एंड संस समीक्षा: फिल्म चार दीवारी के अंदर बिखरे हुए घर को दिखाती है
Fri, 18 Mar 2016 03:39 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
सार
ऋषि कपूर सबसे ज्यादा याद रहते हैं। 90 बरस का बूढ़ा दिखाने के लिए उन पर ढेर सारा मेक-अप किया गया मगर उन्होंने आंखों से भावनाएं व्यक्त करने में कसर नहीं छोड़ी।
फिल्म चार दीवारी के अंदर बिखरे हुए घर को दिखाती है, जहां सबका दम घुट-सा रहा है।
चार बर्तन साथ रहेंगे तो बजेंगे भी। किसी घर की कहानी इस पंक्ति के बगैर पूरी नहीं हो सकती। 90 साल के दादू (ऋषि कपूर) के वहां भी यही हाल है। वह बेटे-बहू (रजत कपूर-रत्ना पाठक शाह) के साथ रहते हैं। जिनके दोनों बच्चे ब्रिटेन और अमेरिका में हैं।
बार-बार मरने की प्रेक्टिस करते दादू का एक ही ख्वाब है। पूरे परिवार के साथ बढ़िया तस्वीर खिंचाएं और दीवार पर टांग कर निहारते रहें। तस्वीर के नीचे लिखा होगाः कपूर एंड संस (सिंस 1921)।
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सपने कब आसानी से पूरे होते हैं? दादू के बेटे-बहू में कई वजहों से खटपट है ही, पोते भी पांच साल पहले नाराज होकर चले गए थे। क्या दादू का सपना पूरा होगा?
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हर परिवार के कुछ रहस्य होते हैं
कपूर एंड संस पोस्टर
निर्देशक शकुन बत्रा की फिल्म परिवार के अंदर चलने वाली रिश्तों की कश्मकश को दिखाती है। पति-पत्नी से लेकर बेटों का आपसी तनाव, बच्चों के साथ मां-बाप के रिश्ते, दादा के साथ पोतों का रिश्ता। यहां कुछ दिल को छूने वाले चित्र सामने आते हैं।
अमूमन परिवार में बड़ा बेटा खास माना जाता है तो छोटे को लगातार खुद को साबित करने के लिए कुछ विशेष करने की जरूरत महसूस होती है। यहां भी बड़ा (फवाद खान) कामयाब राइटर है और छोटा (सिद्धार्थ मल्होत्रा) जिंदगी में संघर्ष कर रहा है।
पेंच और भी हैं। हर परिवार के कुछ रहस्य होते हैं। जब कभी ये उभर आते हैं तो बड़े हादसा की वजह बनते हैं। कपूर खानदान की इस कहानी में भी ऐसा है।
करण जौहर की फिल्मों में समलैंगिक किरदार महत्वपूर्ण जगह पाते है
कपूर एंड संस
फिल्म रिश्तों के तानेबाने को पकड़ कर बढ़ती है परंतु देखने के पारंपरिक लिहाज से पारिवारिक नहीं कही जा सकती क्योंकि युवा पीढ़ी के चरित्र को रेखांकित हुए निर्देशक ने कई जगह बेवजह यौन संकेत उभारे हैं।
ऐसी बातों से यह धारणा पुख्ता होती है कि युवा सेक्स के अलावा कुछ सोचते नहीं। ऐसा नहीं कि यह बातें परहेज का विषय हैं।
फिल्म में दादू के सपनों की रानी, मंदाकिनी कहानी में रंग भरती है। यहां सेक्स का एक ट्रेक काफी था। निर्माता करण जौहर की फिल्मों में समलैंगिक किरदार महत्वपूर्ण जगह पाते हैं। वह यहां भी है।
कपूर एंड संस आखिरी कुछ मिनटों को छोड़ पारिवारिक टेंशन ज्यादा और इमोशन कम दिखाती है। रजत कपूर और रत्ना पाठक शाह तनाव के पलों को बेहतरीन ढंग से उभारने में सफल हैं। फवाद खान प्रभाव छोड़ते हैं। उनमें अच्छे अभिनेता वाली बात नजर आती है।
सिद्धार्थ मल्होत्रा कुछ दृश्यों में प्रभावित करते हैं मगर निर्देशक ने उन्हें और आलिया भट्ट को असल जिंदगी के प्रेमी-प्रेमिका के रूप में उभारने पर ज्यादा काम किया। आलिया सबसे कमजोर कड़ी हैं। यहां न वह ग्लैमरस हैं और न अच्छी अभिनेत्री। कहीं-कहीं वह हास्यास्पद हो जाती हैं।
ऋषि कपूर सबसे ज्यादा याद रहते हैं। 90 बरस का बूढ़ा दिखाने के लिए उन पर ढेर सारा मेक-अप किया गया मगर उन्होंने आंखों से भावनाएं व्यक्त करने में कसर नहीं छोड़ी।
फिल्म चार दीवारी के अंदर बिखरे हुए घर को दिखाती है, जहां सबका दम घुट-सा रहा है। अंत होते-होते निदा फाजली का यह शेर याद आता हैः घर की तामीर चाहे जैसी हो/इसमें रोने की कुछ जगह रखना।