हीरो आया। हीरो ने बॉडी दिखाई। हीरो ने हीरोइन को बदमाश एक्स-लवर से बचाया। हीरो ने हीरोइन का दिल जीता। हीरोइन ने हीरो से कहा कि तुम अच्छे आदमी हो गुंडई छोड़ दो। हीरो ने हीरोइन को वचन दिया। गुंडई छोड़ दी। हीरोइन के पुलिसवाले पापा तब भी नहीं माने।
हीरो ने हीरोइन के पापा से कहा कि आप और मैं एक ही हैं क्योंकि दोनों लड़की का भला चाहते हैं। हम सिर्फ एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। हीरो की बात पुलिसवाले पापा को छू गई। उनकी आंखें नम हो गईं। हीरो के सामने विलेन भी थे, जो सुधरे हीरो को पीट रहे थे।
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अंत में पुलिसवाले पापा ने उस विलेन को गोली मार दी जो हीरो की पीठ पर वार कर रहा था। इस तरह हीरो-हीरोइन का मिलन हो गया। 131 शब्दों यह उस 131 मिनट का सार है, जिसे निर्देशक निखिल आडवाणी ने फिल्म हीरो के रूप में पर्दे पर उतारा है।
निखिल आडवाणी पूरी तरह से नाकाम रहे हैं
निर्देशक सुभाष घई की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक हीरो (1983: जैकी श्रॉफ-मीनाक्षी शेषाद्री) का यह अधिकृत रीमेक है। जो मूल फिल्म के मुकाबले किसी स्तर पर नहीं ठहरता। अगर आपने घई की हीरो नहीं देखी तो उसे देखिए।
ओल्ड इज गोल्ड! निखिल आडवाणी और उनके लेखक हीरो की रीमेक को आज की फिल्म बना पाने में तो नाकाम रहे ही, मूल फिल्म की नकल भी ढंग से नहीं कर सके। हीरो की और भी मुश्किलें हैं।
सूरज की जिंदगी की ट्रेजडी क्या है? अंत तक पता नहीं चलता। जेल में बंद आदित्य पंचोली को वह बाबा कह कर बुलाता है। मगर ऐसा व्यवहार करता है जैसे उनका गुलाम है। सूरज के अंगूठे के पीछे ‘मां’ टैटू बना है। वह क्यों है। मां की क्या कहानी है। मां-बाबा का क्या किस्सा है।
कहानी में ऐसे कई सिरे गायब हैं। फिल्म पर बीईंग ह्यूमन इफेक्ट भी है। सूरज गुंडा है, मगर दिलदार है। लूट का पैसा गरीबों में बांटता है। आदित्य पंचोली माफिया और नेता का मिला-जुला रूप लगे हैं। उनका रोल अस्पष्ट है।
सूरज की अभिनय प्रतिभा बॉडी दिखाने में खर्च की
आदित्य द्वारा एक पत्रकार की हत्या सिर्फ शब्दों में सिमटी है। केस फिल्म के बीच में गायब हो जाता है। कुल मिला कर स्क्रिप्ट अतार्किक ढंग से लिखी गई है। फिल्म में भावनात्मक सिरे गायब हैं। न तो हीरो-हीरोइन का प्रेम सही ढंग से उभरता है और न पिता-पुत्री के रिश्ते।
फिल्म से बॉलीवुड के दो परिवारों की नई पीढ़ी सिनेमा में कदम रख रही है। आदित्य पंचोली के बेटे सूरज की अभिनय प्रतिभा से ज्यादा ऊर्जा उनकी बॉडी दिखाने में खर्च की गई। वहीं सुनील शेट्टी की बेटी आथिया पूरी तरह भारतीय परिधानों में सिर से पैर तक ढंकी हैं।
किसिंग सीन प्रोड्यूसर सलमान खान ने हटवा दिया। हीरो-हीरोइन की पहली फिल्म बताती है कि दोनों को अभी अभिनय सीखना है। स्क्रीन प्रेजेंस से वे प्रभावित नहीं करते। सिने-परिवार से आने के कारण उन्हें आगे मौके मिलते रहेंगे। प्रतिभा का पैमाना बाहर वालों के लिए है।
फिल्म के माध्यम से सूरज की निजी जिंदगी में झांकने की कोशिश
सलमान खान अपनी फिल्मी छवि से असल जिंदगी के विवादों को ढंकने की कोशिश करते रहे हैं। फिल्म हीरो भी सूरज के लिए कमोबेश यही प्रयास करती है। सूरज अभिनेत्री जिया खान की रहस्यमय मृत्यु के प्रकरण में जेल हो आए हैं। फिल्म में नायिका पिता से अपील करती है कि हीरो के अतीत को स्मृति से ‘डिलीट’ कर दें। वह सुधर गया है।
अप्रत्यक्ष रूप से यह अपील दर्शकों से भी है। फिल्म की कमजोर कड़ियों में तिग्मांशु धूलिया शामिल हैं। वह सीनियर पुलिस अफसर की तरह नहीं दिखे। बेटी का अपहरण होने की बाद भी उनके चेहरे के हाव भाव और बॉडी लैंग्वेज नहीं बदलते। हर दृश्य में वह समान हैं। कुल मिला कर हीरो यह जानने के लिए देखी जा सकती है कि अच्छी फिल्म में क्या कमियां नहीं होनी चाहिए।
स्क्रिप्ट, कास्टिंग और अभिनय हर स्तर पर। जीवन में हीरो की जरूरत सबको होती है। आदर्श व्यक्तित्वों के पाठ स्कूल से ही पढ़ाए जाते हैं। सिनेमा में भी हम अपने हीरो ढूंढने जाते हैं। अगर आपके जीवन में हीरो नहीं है तो यह फिल्म आपकी मदद नहीं कर सकती। अगर है, तो साफ-साफ कह सकते हैं कि तू मेरा हीरो नहीं। समय, जेब और हीरो हमेशा अपने होने चाहिए।