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फिल्म समीक्षा/ढिशुम:मारा-मारी जरूरी नहीं

Fri, 29 Jul 2016 03:51 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
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निर्माताः साजिद नाडियाडवाला
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निर्देशकः रोहित धवन
सितारेः जॉन अब्राहम, वरुण धवन, जैकलीन फर्नांडिस, साकिब सलीम, अक्षय खन्ना, राहुल देव
रेटिंग **

ढिशुम देखना चाहते हैं तो थोड़ी तसल्ली रखें। इसके लिए मारा-मारी की जरूरत नहीं। यह एक औसत मसाला फिल्म है, जिसे देखने का मजा तभी है जब आपको लगे कि जेब काफी माल है और इसे थोड़ा ढीला करने से घर के बजट पर खास फर्क नहीं पड़ेगा। कहानी संक्षेप में आकर्षित करती है मगर जब आप उसे पर्दे पर रूप-आकार लेते देखते हैं तो कुछ ठगा-सा महसूस करते हैं।

भारतीय क्रिकेट टीम खाड़ी देश में खेल रही है। त्रिकोणीय टूर्नामेंट में भारत को फाइनल में पाकिस्तान से भिड़ना है। तभी टीम का टॉप फॉर्म बल्लेबाज विराज शर्मा (साकिब सलीम) गायब हो जाता है। भारतीय विदेश मंत्री के ई-मेल पर एक वीडियो आता है जो बताता है कि विराज को एक सनकी फैन ने उठा लिया है। उसका कहना है कि अगर मैच कैंसिल किया गया तो वह खिलाड़ी को खत्म कर देगा!
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खाड़ी देश की सरकार से बात करते हुए विदेश मंत्री कहती हैं कि यह मामला संभालने के लिए उनका एक खास अफसर वहां पहुंचेगा। यह है कबीर (जॉन अब्राहम)। दुबई में कबीर को भारतीय मूल के जूनियर अफसर जुनैद (वरुण धवन) का साथ मिलता है। विराज की खोज के सफर में उन्हें भारत से फरार बार-बार नाम बदलने वाली एक अमीर लड़की (जैकलीन फर्नांडिस) मिलती है। आखिर क्या है विराज के खोने का सच...?
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जॉन के फैंस को फिल्म पसंद आएगी

ढिशुम अपने मूल आइडिये से इतर एक ढीली फिल्म है, जो आगे बढ़ने के साथ रोमांच बरकरार नहीं रख पाती। फिल्मी लटकों-झटकों के बीच कबीर और जुनैद तालमेल बैठाने की कोशिश तो करते हैं परंतु मुन्नाभाई और सर्किट की याद दिलाते हुए उनसे कहीं पीछे रह जाते हैं। जॉन अपने ऐक्शन वाले रूखे अंदाज में हैं और उनके फैन्स को यह पसंद आ सकता है। यही स्थिति वरुण की है। युवा उनके लिए फिल्म देख सकते हैं। मगर जुनैद का किरदार ऐसे नहीं निखरता कि  उस पर आपका दिल आ जाए।

जैकलीन फर्नांडिस के खाते में ग्लैमर की भरपाई का काम है। जबकि साकिब क्रिकेट के मैदान पर फिट हैं। फिल्म को खूबसूरती से शूट किया गया है और खाड़ी देशों की चमक पर्दे पर उभरती है। इसके बावजूद फिल्म आपको सिनेमाघर के बाहर किसी कारण से याद रहे, ऐसा कुछ नहीं है।

निर्देशक के रूप में रोहित ने तकनीकी दृश्य रचने में ज्यादा ध्यान दिया है। कहानी कई जगहों पर खींची गई है। ढिशुम टाइटल के बावजूद ऐक्शन उल्लेखनीय नहीं है। यह बात गले नहीं उतरती कि कुल दो-तीन बुकी टाइप के लोगों ने एक दिग्गज खिलाड़ी को उठा लिया और भारत सरकार से फिरौती के रूप में पांच सौ करोड़ की उगाही कर ली।

अक्षय खन्ना का तंज कसते हुए संवाद बोलने का अंदाज तो आकर्षक है मगर उनमें ऐसे विलेन वाली बात नहीं है जो दिलों में डर पैदा कर सके। वह पर्दे पर बहुत कमजोर नजर आते हैं। सौ तरह के रोग ले लूं... गाना ही फिल्म के संगीत का एकमात्र उजला पक्ष है।
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