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बैंगिस्तान: व्यंग्य नहीं कुछ और है, पहले पढ़ लें पूरी समीक्षा

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- निर्माताः रितेश सिधवानी
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- निर्देशकः करन अंशुमान
- सितारेः रितेश देशमुख, पुलकित सम्राट, कुमद मिश्रा, जैकलीन फर्नांडीज
रेटिंग *

दुनिया के नक्शे पर कहीं एक गुमनाम देश हैः बैंगिस्तान। यह दो हिस्सों में बंटा है। इसके बाशिंदे दो अलग-अलग धर्मों को मानते हैं। धर्म की आड़ में होने वाली राजनीति से यहां सदा अशांति फैली रहती है। जबकि धर्मगुरु चाहते हैं कि हिंसा खत्म हो, शांति स्थापित हो। निर्देशक करन अंशुमान और उनके फिल्म लेखकों की टीम ऐसी ही कुछ पंक्तियों के बाद चुक जाती है।

उसकी कल्पनाशीलता बैंगिस्तान शब्द के बाद औंधे मुंह जमीन पर गिर पड़ती है। वह हिंदू-मुसलमान, शांति-आतंकवाद, धर्म-राजनीति के दुनियावी विमर्श की हकीकत पर उतर आते हैं। हालांकि उनका दावा है कि वह जो कुछ कह रहे हैं, वह काल्पनिक है और उसका अंदाज कॉमिक है। जबकि ऐसा कतई नहीं है।
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बैंगिस्तान के नाम पर शुरू होने वाली कहानी में कुछ ही मिनटों में...

बैंगिस्तान के नाम पर शुरू होने वाली कहानी में कुछ ही मिनटों में दो सीधे-सादे नौजवानों की एंट्री होती है। उन्हें धर्म के नाम पर बरगलाया जाता है और पोलैंड में शांति स्थापना के लिए होने वाली धर्म संसद में विस्फोट करने को तैयार किया जाता है। दोनों ‘नादान’ मान जाते हैं और आत्मघाती हमलावर बन कर पहुंचते हैं पोलैंड। वहां पहले एक-दूसरे के दोस्त और फिर दुश्मन बनते हैं। अंततः उन्हें समझ आता है कि वे मोहरा बन गए हैं। तब वह मिलकर धर्मोन्मादियों के इरादों को ध्वस्त कर देते हैं।

बैंगिस्तान को कुछ इस्लामी देशों में रिलीज नहीं होने दिया जा रहा है। जिसका मतलब साफ है कि फिल्म में दिखाए इस्लाम और हरे रंग को वह देश हकीकत के चश्मे से देख रहे हैं। उन देशों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है। भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है इसलिए अगर आप बैंगिस्तान में दिखाए गए हिंदुत्व और भगवा रंग को सच मान कर देखेंगे तो आपकी यह धर्मांधता होगी। सेंसर बोर्ड के सदस्य भले ही देखें लेकिन राष्ट्रवादी न होते हुए भी दर्शक अपनी आंखें और दिमाग बंद करके फिल्म नहीं देख सकते। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से देश लड़ रहा है। आतंकवाद और आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता लेकिन...
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कॉमिक फिल्म बनाने वालों को पहले व्यंग्यकारों को पढ़ना चाहिए

जेहाद के नाम पर खून-खराबा पूरी दुनिया देख रही है। बैंगिस्तान इसी आतंकवाद के समानांतर भगवा रंग को रखती है। हिंदू धर्म के रूप-गुण धारण किए नायक को फिदायीन बनते यहां दिखाया गया है!!

अभी तक इस देश में ऐसा नहीं हुआ और यह निंदनीय कल्पना केवल इस फिल्म को बनाने वालों के दिमाग में है। निःसंदेह यह फिल्म व्यंग्य नहीं है। हिंदी में कॉमिक फिल्म बनाने वाले इन फिल्मकारों को अगली फिल्म से पहले इस भाषा के बेहतरीन व्यंग्यकारों को पढ़ना चाहिए कि राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक विमर्श में कैसे अपनी राय रखनी चाहिए।

रितेश देशमुख का अभिनय जरूर प्रभावित करता है, परंतु पुलकित सम्राट औसत हैं। जैकलीन फर्नांडिज मेहमान की तरह आती-जाती हैं। कुमुद मिश्रा अवश्य दोनों पक्षों के कट्टर धार्मिक लीडर के डबल रोल में निखर कर आते हैं। फिल्म का पहला हिस्सा किसी बचकानी कॉमिक की तरह है, जबकि दूसरे हिस्से में ड्रामा रफ्तार पकड़ता है। पोलैंड में फिल्म शूट हुई है, मगर इसमें वहां की खूबसूरती को कहीं नहीं उभारा गया है। पर्यटन बढ़ाने में फिल्म पोलैंड की मदद नहीं कर सकेगी।
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