-निर्माताः कोटवारा स्टूडियोज
-निर्देशकः मुजफ्फर अली
-सितारेः इमरान अब्बास, पेर्निया कुरैशी, दिलीप ताहिल, बीना काक, मुजफ्फर अली
रेटिंग *1/2
अगर आप ब्रांड में विश्वास करते हैं तो निर्देशक मुजफ्फर अली के नाम पर जांनिसार देख धोखा खाने जैसा महसूस करेंगे। उनका नाम उमराव जान से जुड़ा रहे, वही ठीक है। जो पीढ़ियां उमराव को देख कर बड़ी हुई हैं, उन्हें जांनिसार से बेहद निराशा मिलेगी। नई पीढ़ी जांनिसार देखने के बाद उमराव जान देखने के खयाल पर दो बार सोचेगी।
जांनिसार गवाह है कि मुजफ्फर अली का सिनेमा वक्त के साथ विकसित नहीं हुआ। इतिहास के खोए पन्नों को सामने लाना कड़े परिश्रम और जोखिम उठाने की मांग करता है। मुजफ्फर अली ने फिल्म को बनाने में कड़ा परिश्रम किया और जोखिम भी उठाया। परंतु इसमें ऐसी कोई नई और विशेष बात निकल कर सामने नहीं आती कि आप चौंकें या कम से कम उससे भावनात्मक रूप से जुड़ें।
सांसद शशि थरूर का वो वीडियो इससे ज्यादा प्रभावशाली है
अंग्रेजों ने इस देश को करीब सौ साल तक गुलाम बनाए रखा। लोगों पर अमानवीय अत्याचार किए। देश की संपदा को लूटा। इतिहास को गलत ढंग से लिखा। देश की सांस्कृतिक समरसता में जहर घोला। फूट डालो राज करो की नीति का नतीजा यह निकला कि महान भारतवर्ष का उनके जाते-जाते विभाजन हो गया।
अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए लाखों गुमनामों ने शहादत दी। निश्चित रूप से अंग्रजों को तमाम बातों के लिए माफी नहीं दी जा सकती और हिसाब करने बैठें तो फिरंगी सदियों तक इस देश का ऋण नहीं चुका सकेंगे। यह सारी बातें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में मुजफ्फर अली जांनिसार में अपने दर्शकों से कहते हैं।
परंतु वक्त बदल चुका है और कहने के लिए नए अंदाज की जरूरत है। संभवतः इसीलिए सांसद शशि थरूर ब्रिटेन जाकर अंग्रेजों को जो खरी-खरी सुनाते हैं, यू-ट्यूब पर कुछ मिनटों का वह वीडियो मुजफ्फर अली की दो घंटे से ज्यादा की फिल्म से कहीं सटीक मालूम पड़ता है।
हीरो के रूप में इमरान अब्बास पिछली फिल्म अलोन से बेहतर हैं
जांनिसार की कहानी 1857 की क्रांति के बीस साल बाद का अवध दिखाती है। क्रांति के दौरान एक नन्हें राजकुमार को अंग्रेज ब्रिटेन ले जाते हैं और उसे अपने अंदाज में पाल-पोस कर बड़ा करते हैं। वह अंग्रेज बन कर अपने देश लौटता है। यहां उसे एक कोठेवाली से प्यार हो जाता है।
उसकी सोहबत में वह अंग्रेजों की सच्चाई जानता-समझता है और अंततः अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठा लेता है। यह सरल रेखा-सी कहानी दर्शकों को किसी मोड़ पर नहीं बांधती। न तो नायक-नायिका का प्रेम संवेदना और गहराई से उभर पाता है और न अपने वतन की आजादी के लिए उनका जज्बा। गीत-संगीत और नृत्य भी दिल को नहीं छूते। कुछ दृश्य ऐसे लगते हैं मानो उन्हें टीवी धारावाहिक के लिए शूट किया गया है।
हीरो के रूप में इमरान अब्बास पिछली फिल्म अलोन से बेहतर हैं। वहीं अपनी पहली फिल्म में पेर्निया कुरैशी प्रभाव नहीं छोड़ पातीं। नायक के नाना बने दिलीप ताहिल अपनी भूमिका में जमे हैं। कुल जमा जांनिसार के साथ मुजफ्फर अली की वापसी उनके चाहने वालों को निराश ही करती है। बेहतर है कि उमराव जान ही फिर से देखी जाए।