लीक से हटकर उठाया विषय, लेकिन उबाऊ ट्रीटमेंट। निर्देशक फराज हैदर की यह फिल्म एक साहसी कोशिश जरूर है, परंतु इसमें कई कमियां हैं। जिस कारण फिल्म औसत होकर रह जाती है। भारत-पाकिस्तान के तनाव के बीच इसमें सबसे ज्यादा निशाने पर हैं चीन और अमेरिका।
दोनों अपना उल्लू सीधा करने के लिए इन पड़ोसी देशों के भाईचारे को चर जाना चाहते हैं। उन्हें लड़ाते रहते हैं। निर्देशक का दोनों देशों के नेतृत्व को संदेश है, तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जरा...! दिलीप ताहिल को निर्देशक ने अलग-अलग रूप दिए हैं।
भारतीय रक्षा मंत्री, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री, चीनी नेता और अमेरिकी हथियार डीलर। कुल मिला कर कहने की कोशिश यह कि शांति के रंग में भंग डालने वाले चेहरे हर जगह एक-से हैं। फिल्म की मुश्किल यह है कि यह टुकड़ों में अच्छी है। इसमें बहुत सारे झोल हैं।
कॉमेडी ऐसी नहीं कि हंसा सके। सीमा पर मौजूद दोनों देशों के सैन्य अफसरों द्वारा संवाद के लिए लाउडस्पीकर काम में लाने वाले दृश्य बार-बार इस तरह से दोहराए गए हैं कि आप ऊब जाते हैं। फिल्म की स्क्रिप्ट कमजोर है। कल्पनाशीलता की कमी है।
फिल्म शुरू होती है कंटीली बॉर्डर पर दोनों देशों के कैप्टन, राज एस. राणा (शरमन जोशी) और कुरैशी (जावेद जाफरी) की दोस्ती के साथ। वे रात के अंधेरे में बैठकर ताश खेलते है। जबकि भारत-पाक के बीच जंग की घोषणा होने वाली है। देश का रक्षा मंत्री एक टीवी पत्रकार (सोहा अली खान) को एक्सक्लूसिव जानकारी देता है और उसे लेकर सीमा पर पहुंचता है।
सैनिकों के बीच उत्साह भरा भाषण देता है। पत्रकार से वह टेप ले लेता है कि उसे दो दिनों बाद जब युद्ध शुरू होता तब मीडिया में बांटा जाएगा। सीमा पर पत्रकार राणा को दिल दे बैठती है और गोलाबारी के बीच पहुंच जाती है। वह राणा को समझाती है कि जब तक सुबह युद्ध की औपचारिक घोषणा होगी, तब तक वह कुछ ऐसा करेगी जिससे युद्ध टल जाए।
फिल्म में युद्ध के पीछे होने वाली राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय राजनीति को कॉमिक ढंग से दिखाया गया है। दोनों देशों के सैनिकों और नागरिकों के भावनाओं को दिखाया गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया न्यूज का कैसे मखौल बनाता है। लेकिन इन सबके बीच कोई ठोस तारतम्य नहीं है।
सब कुछ बिखरा हुआ है। अगर बहुत ही जरूरी समझें तो यह फिल्म देखने जाएं। वर्ना यह कहने में भी कोई बुराई नहीं कि छोड़ ना यार...!