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'दोजख' में देखिए गंगा-जमुनी संस्कृति का सिनेमा

Fri, 20 Mar 2015 11:33 AM IST
रवि बुले/ अमर उजाला, मुंबई ब्यूरो
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बीते दो दशक में हिंदी कला फिल्मों की छोटी-छोटी धाराओं का अस्तित्व बॉलीवुड की विशाल नदिया में समा कर लगभग समाप्त हो चुका है। इधर कॉमर्शियल फिल्मों के साथ कला के मिक्स के नाम पर जो सिनेमा बन रहा है वह अक्सर दर्शकों के दिल में गहरा असंतोष पैदा करता है।
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बॉक्स ऑफिस बिजनेस की आड़ में कला को मसालेदार सिनेमा के साथ मिला कर नई दुकानें खुल चुकी हैं। परंतु लेखक-निर्देशक जैगम इमाम की फिल्म दोजखः इन सर्च ऑफ हैवन खालिस कलात्मकता के साथ ऐसी कहानी कहती है जिसकी जड़ें हमारी मिट्टी में हैं। यह भारतीय संस्कृति का सिनेमा है। इसमें आयातित कुछ नहीं है।

फिल्म में मानवीय रिश्तों और धार्मिक विमर्श की है पृष्ठभूमि

फिल्म मानवीय रिश्तों और धार्मिक विमर्श की पृष्ठभूमि में एक पिता-पुत्र का जीवन दिखाती है। बनारस के नजदीक रामनगर में रहने वाले एक इमाम (ललित तिवारी) का बेटा जानू (गैरिक चौधरी) खो गया है। वह परेशान होकर उसे ढूंढ रहे हैं। परंतु उसका कहीं पता नहीं।

कहानी फ्लैशबैक में जाती है और आप पाते हैं कि जानू पिता की अनिच्छा के बावजूद नजदीक के मंदिर के पुजारी से दोस्ती गांठे है। वह मंदिर का प्रसाद खाता है। पुजारी के द्वारा आयोजित रामलीला में हनुमान का किरदार निभाता है। जानू को गंगा नदी के धरती पर उतरने की कहानी आकर्षित करती है और वह उसमें भी स्नान करना चाहता है। पिता-पुत्र के बीच मां एक मजबूत कड़ी है, मगर अचानक एक सड़क दुर्घटना में वह मारी जाती है। इसके बाद जानू गायब है...!

गंगा-जमुनी संस्कृति से दर्शकों को चौंकाएगी फिल्म

फिल्म हिंदू-मुस्लिम मान्यताओं के विस्तार में नहीं जाती, मगर 12 साल का जानू जिस तरह से मुस्लिम होते हुए भी हिंदू संस्कृति के प्रति आकर्षित है, वह दर्शकों को चौंकाता है। गंगा-जमुनी संस्कृति और हिंदू-मुस्लिमों पर उसके प्रभाव की बातें तो तमाम होती हैं, मगर जैगम ने जिस ठोस ढंग से उन्हें पर्दे पर उतार दिया है वह साहसपूर्ण ईमानदारी के बगैर संभव नहीं है।

फिल्म धीरे-धीरे बांधती है और आखिर के पल झकझोर देते हैं। इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि सिनेमा की पहली प्राथमिक जरूरत अच्छी कहानी है। दोजख सिनेमा के उन छात्रों के लिए भी है जिनके पास सीमित संसाधन हैं, मगर वे फिल्म बनाना चाहते हैं।
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इस फिल्म से भविष्य में बेहतर सिनेमा की बंधेगी उम्मीद

एक बेहतरीन कहानी के साथ बेहद कम बजट, तथाकथित सितारों की अनुपस्थिति के बावजूद कैसे जुनून के साथ लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है, दोजख उसका उदाहरण है। दर्शक आज अत्यंत उन्नत तकनीक का चौंधियाने वाला सिनेमा देखने के आदी हो चले हैं। ऐसे में तकनीकी रूप से दोजख जरूर उन्नीस लगती है।

मगर कथ्य इस कमी की भरपाई करता है। इसे यूं भी समझ सकते हैं कि एक जरूरी पुस्तक को पढ़ने से सिर्फ इसलिए इंकार नहीं किया जा सकता कि उसके पन्ने चिकने नहीं हैं और जिल्द ढीली है। अभिनय के स्तर पर ललित तिवारी और गैरिक बेहद विश्वसनीय लगे हैं। अपने किरदारों को उन्होंने पर्दे पर जीवंत किया है। जैगम की यह पहली फिल्म है और उनसे भविष्य में कहीं बेहतर सिनेमा की उम्मीद की जा सकती है।

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