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जानिए अनुष्का शर्मा की फिल्म 'एनएच10' के रास्ते क्या मिलेगा

Fri, 13 Mar 2015 12:05 PM IST
रवि बुले/ अमर उजाला, मुंबई ब्यूरो
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अगर आप कभी दिल्ली-एनसीआर के इलाकों में नहीं रहे हैं तो एनएच10 आपको मीडिया में वहां की कानून की धज्जियां उड़ाने वाली खबरों का एक फील दे सकती है। फिल्म कहानी की तरह नहीं बल्कि ब्रेकिंग न्यूज की तरह शुरू होती है, जब नायिका को रात में अपनी कार लेकर अचानक सड़क पर निकलना पड़ता है और कुछ लोग उसके पीछे लग जाते हैं।
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नतीजा यह कि फिल्म में आपको यकीन करने लायक कहानी का एहसास नहीं होता। आप यहां स्क्रिप्ट के बजाय उसके कुछ टुकड़े पाते हैं, जिनका इस्तेमाल फिल्म को अतार्किक ढंग से अंत तक पहुंचाने के लिए किया गया है। एनएच10 सिनेमा के स्तर पर आपको संतोष नहीं दे पाती।

यूरोपीय और अमेरिकी थ्रिलर के स्टाइल को बॉलीवुड में उतारा

निर्देशक नवदीप सिंह मनोरमाः सिक्स फीट अंडर के करीब आठ साल बाद फिल्म लेकर लौटे हैं। उनसे उम्मीदें थीं। परंतु मनोरमा का आनंद ले चुके दर्शकों को यह उनकी फिल्म नहीं लगती। यहां रहस्य-रोमांच पूरी तरह से गायब है। कहानी के हर दृश्य के साथ आप जानते हैं कि आगे क्या होगा।

मुश्किल यह भी है कि बेहद यथार्थवादी होते-होते एनएच 10 एकाएक दोयम दर्जे की किसी यूरोपीय और अमेरिकी थ्रिलर में तब्दील हो जाती है। फिल्म देश के दो अलग-अलग किस्म के माहौल में पल-बढ़ रही दो पीढ़ियों को पूर्वाग्रह के साथ देखती हुई शुरू होती तथा आगे बढ़ती है।

पहली महानगरों में रहने वाली नए युग की बेहद स्मार्ट युवा पीढ़ी और दूसरी उत्तर के ग्रामीण इलाकों के युवा गंवई। यह युवा सोच में पिछड़े, अनपढ़, क्रूर और हिंसक हैं। जिनके बारे में फिल्म का नायक पिस्तौल ताने हुए कहता है कि मैं सिर्फ डरा कर इन गंवारों का दिमाग ठीक कर दूंगा।

एनएच 10, भागमभाग और अनुष्का शर्मा

एनएच 10 मल्टीनेशनल में काम करने वाले एक दंपति मीरा (अनुष्का) और अर्जुन (नील) की कहानी है, जो एक सप्ताहांत गुजारने के लिए एनसीआर से दूर किसी पांस सितारा होटल में जा रहे हैं क्योंकि नायिका का जन्मदिन आ रहा है। इसी दौरान रास्ते में यह दंपति देखता है कि एक युवक (दर्शन) एक लड़की और उसके दोस्त को उठा कर ले जा रहे हैं।

बाते आगे ऑनर किलिंग तक पहुंचती है और मीरा तथा अर्जुन हत्याओं के गवाह होते हैं। अब उनकी जान खतरे में हैं और वे हत्यारों से बचकर भागते हैं। लेकिन अनदेखे-अनजाने जंगल में बच पाना आसान नहीं है। आधी से ज्यादा फिल्म रात से अंधेरे में हीरो, हीरोइन और विलेन की भागमभाग और चीख-चिल्लाहट में गुजरती है। जिसमें हीरो-हीरोइन एक के बाद एक विलेन तथा उसके लोगों की हत्याएं करते जाते हैं।

अपने पति की हत्या का बदला लेती है नायिका

फिल्म के दूसरे हिस्से में जान बचाने के लिए भाग रही हीरोइन जब पाती है कि उसके पति की मौत हो गई है तो वह वह लगे हाथ कुछ घंटों में हत्यारों से हिसाब चुकता कर लेती है।

अनुष्का फिल्म की निर्माता भी हैं और ऐसा लगता है कि पूरी फिल्म सिर्फ उन्हें स्थापित करने के लिए है। हर फ्रेम में केवल वही हैं। भागती-दौड़ती-बदहवास और ऐक्शन दृश्यों में दुश्मनों को ठिकाने लगाती हुईं।

एक तरफ फिल्म के विलेन बर्बर, क्रूर और शक्तिशाली हैं, दूसरी तरफ वे इतनी आसानी से नायिका के हाथों एक-एक कोशिश में ही मार दिए जाते हैं कि आश्चर्य होता है।
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डार्क सिनेमा पसंद करने वालों के लिए ‌है 'एनएच10'

फिल्म में गंदे शब्दों, गालियों और हिंसा को पर्याप्त जगह मिली है और इसके बावजूद सेंसर बोर्ड से निर्माताओं को शिकायतें हैं! फिल्म में यह सब देख कर आप सोच में पड़ जाते हैं कि इससे ज्यादा ये लोग और क्या दर्शकों को दिखाना चाहते हैं? नील के लिए फिल्म में करने को बहुत कुछ नहीं है। जबकि मैरी कॉम में तारीफें बटोरने वाले दर्शन कुमार यहां निराश करते हैं।
 
विलेन के रूप में वह केवल यहां-वहां भागते दिखते हैं। पीछा करो, ढूंढों, ज्यादा दूर नहीं गए गए होंगे... जैसे डायलॉग बोलते हुए। कुल मिला कर एनएच10 उन दर्शकों के लिए है जिन्हें बहुत डार्क सिनेमा पसंद आता है और जो यूरोपीय-अमेरिकी सिनेमा की फोटोकॉपियों से भी प्रभावित होते हैं।
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