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Aashram Season 3 Review: डिजिटल का सबक बना ‘आश्रम’ का तीसरा सीजन, प्रकाश झा के प्रशंसकों का इम्तिहान जारी

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आश्रम 3 रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
एक बदनाम आश्रम सीजन 3
कलाकार
बॉबी देओल , चंदन रॉय सान्याल , ईशा गुप्ता , अदिति पोहनकर , त्रिधा चौधरी और अनुरिता झा
लेखक
हबीब फैसल , संजय मासूम , अविनाश कुमार और माधवी भट्ट
निर्देशक
प्रकाश झा
निर्माता
प्रकाश झा
ओटीटी
एमएक्स प्लेयर
रेटिंग
2/5

प्रकाश झा का नाम सिनेमा में आज भी काफी सम्मान से लिया जाता है। जब खेलों पर आधारित सिनेमा की देश में चर्चा ही बिरले होती थी, उन्होंने ‘हिप हिप हुर्रे’ जैसी फिल्म बनाकर देश दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा। फिर ‘दामुल’, ‘परिणीति’, ‘मृत्युदंड’ और ‘गंगाजल’ जैसी फिल्में बनाकर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची में अपना नाम बार बार दर्ज कराया। और, फिर उन्हें सितारों का चस्का लग गया। थोड़ा वक्त और गुजरा तो एक्टिंग भी उन्हें रास आने लगी। फिल्म ‘फ्रॉड सैंया’ तक आते आते बतौर निर्माता वह अपनी साख अपने हाथों हवा में उड़ा चुके थे। बतौर निर्देशक उनका सितारा फिल्म ‘राजनीति’ से डगमगाना शुरू हुआ। हिंदी सिनेमा के सितारों के आभामंडल में किसी कद्दावर निर्देशक के अपनी चमक खो देने की प्रकाश झा नजीर बन चुके हैं। अपने प्रशंसकों के अभी और कई इम्तिहान प्रकाश झा लेने वाले हैं। एमएक्स प्लेयर की अपनी सीरीज ‘आश्रम’ का नाम तीसरे सीजन में बदलकर उन्होंने ‘एक बदनाम आश्रम’ कर दिया है। इसके 10 एपीसोड देखना अपने आप में किसी चुनौती से कम नहीं है। और, ये देखने के बाद समझ ही नहीं आता कि ये वही प्रकाश झा हैं जिन्होंने कभी सर्वश्रेष्ठ पटकथा का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीता।

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आश्रम 3 रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
चमक खोती कहानी, लचर पटकथा गलतियां सबसे होती है। सिनेमा भी गलतियां करके ही समझ आता है। प्रकाश झा की वेब सीरीज ‘एक बदनाम आश्रम’ उनकी ‘सत्याग्रह’ और ‘जय गंगाजल’ के बाद तीसरी बड़ी गलती है। दुनिया की निगाहों में संत बनकर घूमने वाले बाबाओं या धर्मगुरुओं के अपराधों की कहानी पर देश दुनिया में तमाम धमाकेदार कहानियां परदे के लिए लिखी जा चुकी है। लोगों ने इन्हें पसंद भी किया लेकिन वेब सीरीज ‘एक बदनाम आश्रम’ अपनी लिखावट में ही सबसे ज्यादा मार खाती है। देश की अलग अलग जेलों में बंद कथित धर्मगुरुओं के आचरण, व्यवहार और वेशभूषा से प्रेरित जो किरदार बाबा निराला उन्होंने इस सीरीज के पहले सीजन में गढ़ा था, वह निर्देशकीय ईमानदारी न रखे जाने के चलते हमेशा नकली सा ही लगा। दूसरे सीजन के आखिर में उसके चंगुल से पम्मी भागती है, तीसरे सीजन की आधी कहानी दो इन दोनों के बीच चलती चूहा बिल्ली की दौड़ में ही फंसी रहती है। बाबा को लगता है कि उसे अपने ब्रांड फिर से चमकाने की जरूरत है तो इसके लिए पेशेवर लोग लाए जाते हैं। और, कहानी उस मोड़ पर आकर ठहरती है जहां लगता है कि प्रकाश झा अभी इसका कम से कम एक सीजन तो और बनाने वाले हैं और क्या पता कि उन्होंने पिछली बार की तरह इस बार भी दो सीजन एक साथ ही शूट कर डाले हों।

आश्रम 3 रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बॉबी देओल के तेवर कायम वेब सीरीज ‘एक बदनाम आश्रम’ को 10 एपीसोड तक देखने की ललक कहें या कि मजबूरी सिर्फ इसके दो प्रमुख कलाकारों बॉबी देओल और चंदन रॉय सान्याल की वजह से बनी रहती है। एक कमजोर कहानी पर लिखी लचर पटकथा में दोनों अपनी तरफ से पूरी जान डालने की कोशिश करते दिखते हैं। बॉबी देओल का ये रूप पहले सीजन से चौंकाता रहा है। एक भ्रष्ट, धूर्त, सत्तालोलुप और कामातुर बाबा के किरदार ने ही बॉबी देओल की अभिनय क्षमता से दुनिया को परिचित कराया। लोगों ने इसे समझा भी लेकिन उनके इस रंग रूप के मुफीद कहानियां उन तक अभी और पहुंचनी जरूरी हैं। ‘क्लास ऑफ 83’ में जो कुछ उन्होंने कमाया था वह सब वह ‘लव हॉस्टल’ में गंवा चुके हैं। बाबा निराला के बराबर दमखम वाला किरदार भोपा स्वामी भी इस कहानी में शुरू से रहा है, ये किरदार निभा रहे चंदन रॉय सान्याल तीसरे सीजन में अपनी ऊर्जा और अपने अभिनय की खनक के चलते तमाम दृश्यों में बॉबी पर भारी पड़ते दिखते हैं।

आश्रम 3 रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
महिला किरदारों पर मेहनत नहीं प्रकाश झा ने वेब सीरीज ‘एक बदनाम आश्रम’ के तीसरे सीजन तक आते आते अपनी वह नजर भी खो दी है जिसके लिए वह सिनेमा में सम्मान पाते रहे हैं। ये नजर है कहानी के महिला किरदारों को उनकी अपनी पहचान के साथ पेश करना। यहां पूरी सीरीज का हर महिला किरदार पुरुषों की निगाहों से होने वाले एक्सरे से गुजरता रहता है। ईशा गुप्ता तक को उन्होंने पेश किया तो एक ऐसे नजरिये से जो उनके किरदार की गरिमा को गिरा देता है। अदिति पोहनकर की अभिनय कथा अब खोखली हो चुकी है। उनके पास हर दृश्य के लिए तयशुदा भाव हैं। त्रिधा चौधरी का काम उनसे बेहतर बन पड़ा है और अपनी संक्षिप्त सी भूमिका में अनुरिता झा ने भी अपना असर छोड़ा है। अनुरिता को अच्छे किरदार मिले तो वह डिजिटल की अगली ‘राधिका आप्टे’ बन सकती हैं। अनुप्रिया गोयनका, दर्शन कुमार और अध्ययन सुमन के किरदार इस बार पूरी तरह हाशिये पर चले गए हैं।
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आश्रम 3 रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
देखें कि न देखें ‘एक बदनाम आश्रम’ के एपीसोड काफी लंबे लंबे हैं और इसके दृश्य देखकर यूं भी लगता है कि जैसे प्रकाश झा ने ‘एक्शन’ बोलने के बाद थोड़ा बहुत काम और भी निपटा लिया और फिर लौटकर आकर ‘कट’ बोल दिया। सीन चलते जाते हैं, चलते जाते हैं, गनीमत है कि ओटीटी पर फास्ट फॉरवर्ड का ऑप्शन भी मौजूद है। चूंकि सीरीज का कप्तान यानी इसका निर्देशक ही अपनी पकड़ सीरीज पर से खो चुका है लिहाजा बाकी तकनीकी टीम को दोष देना भी ठीक नहीं। सीरीज बहुत बोरिंग है। इस पर अपना समय ना ही नष्ट करें तो बेहतर।

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