कभी सोचा आपने कि लेखकों की सुपरहिट जोड़ी सलीम-जावेद ने कभी खुद फिल्म निर्देशन बनने के बारे में क्यों नहीं सोचा? या फिर कि संजय लीला भंसाली की फिल्म मसलन ‘गोलियों की रासलीला-रामलीला’, ‘बाजीराव मस्तानी’ और ‘पद्मावत’ देखने के बाद आपको क्या याद रहा, इसकी कहानी या इसके कलाकारों का अभिनय या फिर इन्हें परदे पर पेश करने का इनके निर्देशक संजय लीला भंसाली का अंदाज? सवाल दोनों टेढ़े हैं। इन टेढ़ी-मेढ़ी सुपरहिट कहानियों के अलावा ‘ब्रदर्स’, ‘राब्ता’, ‘पल पल दिल के पास’, ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ और ‘जबरिया जोड़ी’ जैसी फिल्मों की क्रेडिट्स में चमकी सिद्धार्थ-गरिमा की अरसे से बनती रही फिल्म ‘दुकान’ आखिरकार सिनेमाघरों में पहुंच गई है। बीते एक दशक से इस कहानी पर दोनों काम करते रहे और इस दौरान किराए की कोख को लेकर न सिर्फ देश में नए कानून बने बल्कि इस कानून के चलते महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ ठिकानों पर चलने वाली किराए की कोख की ‘दुकानों’ को भी अपना शटर गिराना पड़ा।
दुकान मूवी रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पहले समझिए सरोगेसी क्या है?
एकता कपूर, करण जौहर, तुषार कपूर और यहां तक कि शाहरुख खान जैसे सितारों ने सरोगेसी (किराए की कोख) के जरिये बच्चे जन्मे हैं। फिल्म ‘दुकान’ के उपसंहार में खान और कपूर सितारों का जिक्र भी आता है। लेकिन, अगर 2021 में बना कानून दशक भर पहले अमल में आ गया होता तो इन सितारों में से कोई भी सरोगेसी से बच्चे नहीं पा सकता था। सरोगेसी कानून साफ कहता है कि अगर किसी दंपती के पहले से जीवित बच्चे हैं तो वह किराए की कोख नहीं अपना सकता। या फिर कि कोई एकल व्यक्ति सरोगेसी के जरिये मां या बाप नहीं बन सकता। लेकिन, फिल्म ‘दुकान’ की कहानी इस कानून से बनने के पहले की है। परदे पर कहानी की शुरुआत और इसके उपसंहार के वर्षों का जिक्र भी आता रहता है लेकिन दिन, महीने, साल गुजरते जाते हैं, इसके मुख्य किरदारों पर इसका कोई फर्क पड़ता दिखता नहीं है और फिल्म ‘दुकान’ इन सबके चलते अपनी प्रासंगिकता आज के समय में खो देती है। कृति सेनन को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाने वाली फिल्म ‘मिमी’ का विषय भी कुछ कुछ ऐसा ही रहा है लेकिन वह ओटीटी पर आई और खूब देखी भी गई। ‘दुकान’ सिनेमाघरों में सजी है और इसके कितने ग्राहक बनेंगे, कहना मुश्किल है।
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नहीं दिखा असल दर्द का दरिया
फिल्म ‘दुकान’ कोई दो साल से बनकर तैयार फिल्म है। सरोगेसी कानूनों में इन दो साल में भी कई बदलाव हुए हैं। ये फिल्म उतनी कानूनी पचड़े वाली है भी नहीं, जितनी कि इसे बनाने की कोशिश की गई है। फिल्म की एक लाइन की कहानी बहुत मार्मिक है और वह ये कि अगर किसी दंपती का परिवार बढ़ाने के लिए अपनी कोख किराए पर देने वाली मां को अपने गर्भ से जन्मने वाले बच्चे से प्यार हो जाए तो क्या होगा? कहानी के इस सबसे खास बिंदु को भी इसके लेखकों ने बहुत ही सामान्य बना दिया है। उसे बच्चे से प्यार है या नहीं, ये स्थापित करने से पहले ही सिर्फ बच्चे को अपना दूध न पिला पाने की बात सुनकर सरोगेट मां भाग जाती है और कहीं दूर जाकर इस बच्चे को जन्म देती है। कहानी इसके बाद इस बच्चे के इसके कानूनी मां-बाप तक पहुंचने और इस दंपती के सरोगेट मां को अपने परिवार का हिस्सा मानने की जंग दिखाती है। लेकिन, इस मूल कहानी तक आने से पहले फिल्म सरोगेट मां का बचपन, किशोरावस्था और जवानी में ही अपने से तीन साल छोटी किशोरी की सौतेली मां बन जाने में इतनी खोई रहती है कि दर्शक फिल्म के मूल मुद्दे तक आने से पहले ही उकताने लगते हैं।
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निर्देशन की नाकामी सब पर भारी
सिद्धार्थ-गरिमा को हिंदी सिनेमा की कुछ ब्लॉकबस्टर फिल्मों के लेखन का इकराम हासिल है। भंसाली की फिल्मों में दिखने वाली भव्य लोकपरंपराएं उन्होंने इस फिल्म में भी रखी हैं। हवा में उड़ती चुनरियां, जमीन पर बनी रंगोली, टॉप एंगल कैमरे से फिल्माए गए नृत्य दृश्य, गानों में सहायक कलाकारों के वस्त्रों की रंगीनियां और पार्श्वसंगीत के लिए कोरस और ढोल ताशों का इस्तेमाल दोनों को भंसाली का ‘कॉपी कैट’ बनाता चलता है। निर्देशन में सबसे जरूरी है फिल्म को इसकी कहानी के कालखंड के अनुसार परदे पर प्रस्तुत करना और समय के बदलाव के साथ किरदारों के रंग-रूप, देह भाषा और उठने, बोलने व चलने के अंदाज को बदलते रहना। इस मामले में सिद्धार्थ-गरिमा पूरी तरह असफल रहे हैं। उनकी कहानी एक खास सुर को पकड़कर शुरू होती है और कहानी का, इसके किरदारों का कुछ भी हो रहा हो, दोनों अपने सुर से इतना मोहित नजर आते हैं कि इसे बदलने का नाम ही नहीं लेते।
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नाम से ही नकारात्मक बनी फिल्म
फिल्म ‘दुकान’ का पहले तो नाम बहुत ही महिला विरोधी है। किसी के बच्चे की मां बनने को तैयार होने के लिए बहुत संभव है कि उस महिला के सामने कोई न कोई मजबूरी रहती ही होगी। लेकिन, यहां इसे भोग-विलास के साधन जुटाने के लिए ज्यादा जरूरी दिखाया गया है। हैं कुछ गरीब महिलाएं भी लेकिन उनका संदर्भ बहुत ही चलताऊ तरीके से तब आता है जब कहानी की नायिका माथे पर बदनामी लेकर जेल पहुंच जाती है। ये नायिका है ‘जामताड़ा’ वाली मोनिका पंवार। केतकी दवे सरीखा आ रा रा रा कहने की कोशिश करने वाली मोनिका काबिल अभिनेत्री हैं, इसमें शक नहीं लेकिन ये किरदार उनकी अभिनय क्षमता से कहीं ज्यादा विस्तार वाला है। अपने से दूनी उम्र के व्यक्ति से शादी करने वाली चमेली उर्फ जैस्मीन ऐसा क्यों करती है, इसे ढंग से स्थापित करने में भी फिल्म चूक जाती है। बच्चों से प्यार करने वाली जैस्मीन कैसे बच्चों से घृणा करने लगती है और क्यों आखिर एक दिन फिर उसका बच्चों के प्रति प्यार फिर से जाग उठता है, ये ग्राफ किसी भी अभिनेत्री के लिए अपना दम खम साबित करने के लिए बहुत बड़ा मौका है। लेकिन, मोनिका भी फिल्म के लेखकों-निर्देशकों की तरह एक ही सुर में पूरा किरदार निभा देती हैं और एक वक्त के बाद ओवरएक्टिंग भी करते नजर आने लगती हैं।
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सिकंदर का नहीं हुआ ‘पोरस’ से सामना
फिल्म में सिकंदर खेर की मौजूदगी स्पेशल अपीयरेंस सरीखी है। उनका कहानी में आते-जाते रहना एक उम्मीद जगाता है कि अब तक हिंदी सिनेमा में हाशिये पर ही रहा अदाकारी का ये सिकंदर शायद इस बार किसी पोरस के मुकाबिल हो पाएगा। लेकिन, समझ आता है कि वह बस यहां नाम के लिए हैं। मोनाली ठाकुर के अभिनय का अपना अलग ही रंग है। बच्चे के लिए तड़पती मां की बजाय वह एक ऐसी मां के किरदार में नजर आती हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य गरीबों की बेइज्जती करना है। सोहम मजूमदार का अभिनय भी पूरी फिल्म में एक रस ही रहता है। हां, पति की सताई बीवी के किरदार में हिमानी शिवपुरी और उम्मीदों की दुकान चलाने वाली डॉक्टर के किरदार में गीतिका त्यागी का अभिनय असरदार रहा। आईवीएफ क्लीनिक की नियमित सरोगेट मांओं के किरदारों में लिए गए सारे सहायक कलाकार एक जैसी मुस्कान और एक जैसी उदासी एक साथ कैसे ओढ़ लेते हैं, इसका रहस्य जरूर किसी जादू से कम नहीं दिखता।
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नकल हमेशा होती है लेकिन, बराबरी...!
तकनीकी तौर पर फिल्म ‘दुकान’ को संजय लीला भंसाली की तमाम फिल्मों की सस्ती कॉपी बनाने में इसके सिनेमैटोग्राफर अनिर्बान चटर्जी का बहुत बड़ा दोष है। ‘बाजीराव मस्तानी’ के सेट पर रहते हुए उन्होंने जो कुछ भी समझा-परखा, सब यहां उड़ेल दिया है। वह और भी कई बड़ी फिल्मों की टीम का हिस्सा रहे हैं लेकिन एक छायाकार का जो अपना वैल्यू एडीशन किसी फिल्म के लिए होना चाहिए, वह यहां सिरे से नदारद है। सिद्धार्थ-गरिमा ने अपनी इस फिल्म के लिए गाने भी लिखे हैं। अरिजीत ने एक गाना विशेष धन्यवाद पाकर फिल्म के लिए गाया है। और, सनी देओल की तरह वह भी अपने काम की चिप्पी लगाकर निकल गए हैं। समीर तन्ना, अर्श तन्ना और तमन्ना तन्ना की कोरियोग्राफी बस ‘मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं’ में ही अपनी लय-ताल पाती दिखती है। सत्या शर्मा का संपादन इसकी पटकथा और निर्देशन जैसा ही है। चंद्रकांत सोनावणे ने कलाकारों के परिधान बनाने में भंसाली की फिल्मों को ही अपने संदर्भ बिंदु रखा है।