मलयालम सिनेमा में निर्देशक रोशन एंड्रूज का बड़ा नाम रहा है। एक तमिल फिल्म मिलाकर अब तक साउथ सिनेमा में वह एक दर्जन फिल्में बना चुके हैं। हिंदी में उनका डेब्यू फिल्म ‘देवा’ से हो रहा है। वह बार बार कहते रहे हैं कि ‘देवा’ 12 साल पहले आई उनकी ही फिल्म ‘मुंबई पुलिस’ की रीमेक नहीं है। खुद से अपने ही बारे में झूठ बोलकर खुद को खुश करने का मुंबइया सिनेमा का ये रोग रोशन ने अपनी पहली मुंबइया फिल्म की रिलीज से पहले ही क्यों लगाया? इसका उत्तर बस इसी बात में मिल सकता है कि हिंदी फिल्म दर्शकों ने काम चलाऊ रीमेक फिल्मों को भाव देना बंद कर दिया है। नहीं तो करियर तो शाहिद का रीमेक फिल्म ‘कबीर सिंह’ से ही चमका है। अजय देवगन भी ‘दृश्यम 2’ और ‘शैतान’ जैसी रीमेक के बूते ही डटे हुए हैं। लेकिन, रीमेक का मामला है बहुत रिस्की। ‘दृश्यम’ फ्रेंचाइजी का ब्रांड बन चुके मोहन लाल तक तीसरी फिल्म अभी शुरू नहीं कर पाए हैं। और, शाहिद कपूर भी ‘जर्सी’ में रीमेक के रिस्की होने का स्वाद चख चुके हैं।
देवा
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अरब सागर में बही ‘हीरो’ की नैतिकता
बात अगर फिल्म ‘देवा’ की करें तो असल में फिल्म के हीरो का नाम देव है। एक दुर्घटना के बाद अपने डॉक्टर से वह मिलने जाता है तो डॉक्टर उसे समझाता है कि पहले वह देव ए था और अब देव बी है। फिल्म का नाम ‘देवा’ शायद यहीं से निकला है। उधर, इसकी ओरिजिनल मलयालम फिल्म ‘मुंबई पुलिस’ में फिल्म का नाम निकला था फिल्म के तीन मुख्य किरदारों के कोच्चि पहुंचने से पहले मुंबई की क्यू वन ब्रांच में काम करने का मौका मिलने से। यहां भी तीन पुलिस वालों के बीच फिल्म की कहानी वर्ग पहेली हल करने निकलती है। और रास्ते में मिलते हैं, दो एस और दो आर वाले रोशन एंड्रूज, एक अतिरिक्त ई वाले पवैल गुलाटी, दो एस वाले प्रवेश राना और दो बी वाली कुब्रा सैत। कहानी वही है जो ‘मुंबई पुलिस’की थी, बस इस कहानी का रायता यहां थोड़ा ज्यादा फैला है जिसे समेटने के लिए छह राइटर लगाने पड़े हैं।
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पृथ्वीराज का ओरिजिनल किरदार निकला इक्कीस
शाहिद कपूर पर से ‘कबीर सिंह’ का हैंगओवर अभी उतरा नहीं है। या हो ये भी सकता है कि यही उनके अभिनय का स्थायी भाव हो। गुस्सा हालांकि उनका वैसा ही है, जैसा ‘मुंबई पुलिस’ में एंटनी बने पृथ्वीराज सुकुमारन का था। लेकिन, पृथ्वीराज ने वहां खुद को बदला था। यहां शाहिद ने खुद को दोहराया है। कहानी यहां भी एक पुलिस अफसर के हत्या की तफ्तीश पर टिकी है। बस कोच्चि को यहां मुंबई से बदल दिया गया है। ‘देवा’ के पहले पोस्टर में अमिताभ बच्चन दिखे थे तो फिल्म में लगा था कुछ उनका जलवा भी दिखेगा, लेकिन ऐसा कुछ है नहीं। बस एक ‘दीवार’ है और अमिताभ बच्चन हैं। इसके चलते अगर आप ये समझ रहे हैं कि रोशन एंड्रूज का साल 2025 का एंग्री यंग मैन बीती सदी के आठवें दशक के एंग्री यंग मैन जैसा है तो आपकी पसंद संकट में हैं। हीरो वह कैसा भी था, ईमान का पक्का था। इसका ईमान पल भर में डोल जाता है। हिंदी सिनेमा का हीरो अपनी नैतिकता अरब सागर के पानी में बहा आया है।
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नए क्लाइमेक्स की बोतल में पुरानी कहानी
फिल्म ‘देवा’ में सहायक कलाकार खूब हैं। ओरिजिनल में भी थे। वहां पृथ्वीराज के पास कोई हीरोइन नहीं थी। रोशन को किसी ने बताया होगा कि बिना हीरोइन के हिंदी फिल्म नहीं बनती तो उन्होंने पत्रकार का एक नया किरदार ही गढ़ दिया हीरोइन लाने के लिए। और, हीरोइन कौन हैं, पूजा हेगड़े! उनका फिल्म में होना फिल्म फ्लॉप होने की गारंटी सा लगता है। यकीन न हो तो ‘मोहनजो दारो’ से लेकर ‘किसी का भाई किसी की जान’तक का उनका रिकॉर्ड चेक किया जा सकत है। साउथ में भी उनका रिपोर्ट कार्ड कुछ कुछ ऐसा ही है। प्रवेश राणा जरूर प्रभावित करते हैं। पवैल गुलाटी का किरदार ज्यादा कुछ खास करने को था नहीं लेकिन उनको जितना मौका मिला, उतनी देर बैटिंग उन्होंने अच्छी की है। कुब्रा सैत बस फिल्म का वजन बढ़ाने को यहां दिखी हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स रोशन ने हिंदी रीमेक में बदल दिया है। हो ये भी सकता है कि शाहिद कपूर की हिम्मत पृथ्वीराज सुकुमारन जैसी न रही हो और उन्होंने ही एक समलैंगिक किरदार वाला क्लाइमेक्स शूट करने से मना कर दिया हो।
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आधा दर्जन लेखक भी नहीं बना पाए ‘हीरो’
फिल्म ‘देवा’ एक अच्छी मलयालम फिल्म का सस्ता हिंदी संस्करण है। और ये संस्करण बनाने में भी रोशन को 12 साल लगे हैं। फिल्म ‘देवा’देखते समय जो एक बात बार बार याद आती रहती है वह ये कि आखिर इसके पोस्टर पर अमिताभ बच्चन का फोटो लगाने का मतलब क्या रहा होगा? क्या ये कि जब इमरजेंसी से पहले के गुस्सैल हीरो को उस समय की जनता प्यार कर सकती है तो साल 2025 में किरदार से ढीले इस हीरो को जनता क्यों नहीं प्यार करेगी? सामाजिक द्वंद्व का ये एक अच्छा रास्ता चुनने का मौका फिल्म ‘देवा’ के आधा दर्जन के करीब लेखकों के पास रहा। फिल्म ‘मुंबई पुलिस’ के लेखक द्वय बॉबी-संजय को ‘देवा’ के लिखने का भी क्रेडिट मिला है। साथ में दलाल बंधु हैं। सुमित अरोड़ा है और अरशद सईद हैं यानी कुल मिलाकर छह लेखक। रोशन एंड्रूज और शाहिद कपूर के अपने ‘इनपुट’ भी रहे होंगे, लेकिन ये सब मिलकर भी हिंदी सिनेमा को एक नया हीरो दे नहीं पाए। वैसे दोष दर्शकों का भी कम नहीं है। किरदार के ढीले नायकों को पसंद करने वाली दर्शकों की नई पौध ने भी हिंदी सिनेमा को काफी भ्रमित किया है। दर्शकों की ये पीढ़ी चाहती है कि ‘ब्लडी डैडी’ बड़े परदे पर आए, लेकिन ‘बेबी जॉन’ उसे पसंद नहीं।
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सिनेमा के मनोविज्ञान का नया पाठ
समझने वाले समझ सकते हैं कि इन सारी फिल्मों का मनोविज्ञान अलग अलग है। इन कहानियों के नायकों की हिंसा करने की वजह में ही इनकी सफलता और विफलता छुपी है। साउथ सिनेमा के मशहूर स्टंट डायरेक्टर सुप्रीम सुंदर ने ‘एनिमल’ के भी एक्शन दृश्य रचे और ‘देवरा’ के भी। ‘देवा’ में भी वह हैं। उनके अलावा अब्बास अली मुगल, अनिल अरासु, परेज शेख और विक्रम दहिया के नाम एक्शन सीन रचने वाले हुनरमंदों में लिखे हैं। लेकिन, जैसे आधा दर्जन लेखकों के चलते फिल्म ‘देवा’ का अपना कोई ‘कलर’ परदे पर नहीं बन पाता है, वैसे ही इत्ते सारे स्टंट निर्देशक मिलकर भी देव ए या देव बी का कोई सिगनेचर एक्शन स्टाइल नहीं तैयार कर पाते हैं। फिल्म का संगीत विशाल मिश्रा का और गाने ‘भसड़ मचा’के बोल सुनकर ही समझ आ जाता है कि इसे बनाने का मकसद क्या रहा होगा!
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मुंबई जैसा क्यों नहीं दिखता मुंबई?
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इसका फिल्मांकन है। मुंबई को अपनी कर्मस्थली मानने वाली एक कहानी में मुंबई जैसा दिखना चाहिए, वैसा है नहीं। फिल्मों की कहानियों का वातावरण उनको विश्वसनीय बनाने में बड़ी भूमिका निभाता रहा है। खासतौर से तब जब फिल्म के हीरो की बोली और चाल ढाल किसी खास शहर की नुमाइंदगी करती हो। यहां अमित रॉय मुंबई की आत्मा ही नहीं समझ पाए हैं। अपनी फिल्म ‘मुंबई पुलिस’ में जिस तरह से रोशन ने मुंबई की फास्ट लाइफ का जिक्र किया है, वैसी ही मुंबई उन्होंने यहां रचा नहीं है। दिक्कत क्या है, ये फिल्म की तकनीकी टीम ही समझा सकती है। सुभाष साहू की साउंड डिजाइन पर उनका जोर नहीं दिखता है। कब कहां कितनी आवाजें, शोर में तब्दील नहीं होंगी, इसका पैमाना हिंदी सिनेमा में कब का छलक चुका है। हां, फिल्म का कास्टिंग डिपार्टमेंट दमदार है। सहायक कलाकारों की भर्ती करने में मुकेश छाबड़ा फिर नंबर वन रहे।
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