जासूसी उपन्यास सी कहानी का भ्रम
भेस बदलकर स्टिंग ऑपरेशन करने वाला एक नौजवान पत्रकार, पूरे शहर की बिजली गुल, जुलरी की दुकान में पड़ी बड़ी डकैती, फिर डकैतों की वाहन की दुर्घटना, पत्रकार के हाथ लगे तिजोरी से निकले हीरे जवाहरात, एक भ्रष्ट पुलिस अफसर और एक ऐसा शराबी जो ब्लैकमेलर भी है। सुनने में कहानी सुरेंद्र मोहन पाठक या वेद प्रकाश शर्मा के लोकप्रिय उपन्यास जैसी लगती है। लेकिन, इस कहानी में बहत्तर छेद हैं। कहानी का जूस इनसे होकर इतना रिसता है कि दो घंटे दो मिनट की फिल्म देखना किसी चुनौती से कम नहीं है। निर्देशक देवांग भावसार की जिस कहानी को जियो स्टूडियोज ने ये फिल्म बनाते समय सुना होगा, जाहिर है कि फिल्म बनने के बाद ये फिल्म वैसी निकली नहीं।
15 महीने से अटकी पड़ी फिल्म
विक्रांत मैसी की अदाकारी अक्सर सवालों के घेरे में रहती रही है। लेकिन, फिल्म ‘12वीं फेल’ में उन्होंने पहली बार बड़े परदे पर अपनी अदाकारी का जलवा दिखाया। उनका नाम लेकर भी ये फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज नहीं हो सकी। इसे बनाने वाली कंपनी जियो स्टूडियोज की मजबूरी देखिए कि इसे साल भर से ज्यादा इंतजार के बाद अपने ही ओटीटी पर रिलीज करना पड़ा। फिल्म के शुरू में जो सेंसर सर्टिफिकेट आता है, उस पर इसके सेंसर से पास होने की तारीख 19 अप्रैल 2023 लिखी है। सोचिए, इतने दिन से ये फिल्म अपनी रिलीज का इंतजार आखिर क्यों ही करती रही होगी?
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सुनील ग्रोवर के आते ही ढप्पा
कारण जानने के लिए अगर आप ये फिल्म देखने बैठ गए तो जिंदगी के दो बेशकीमती घंटे बर्बाद होने पर खुद को कोसने के अलावा दूसरा कोई रास्ता आपके पास बचेगा नहीं। वैसे सुनील ग्रोवर फिल्म के शुरुआती आधे घंटे में ही इस बात की ताकीद कर देते हैं कि ये फिल्म अब इसके आगे देखना दर्शक के अपने विवेक पर निर्भर है लेकिन क्या करें, समीक्षक का दिल है कि मानता नहीं। सुनील ग्रोवर का किरदार इस फिल्म को पटरी से उतारने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। उनका रिरियाकर बोलना ‘द ग्रेट इंडियन कपिल शो’ को भी खास मदद इस बार नहीं कर पाया और उनके पास अभिनय का कोई दूसरा रंग होगा, ये लगता तो नहीं है।
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देवांग और दलाल बंधुओं का गड़बड़झाला
फिल्म ‘ब्लैकआउट’ की पूरी कल्पना देवांग भावसार की है। वह निर्देशक कूकी गुलाटी के असिस्टेंट रह चुके हैं। विवेक ओबेराय की फिल्म ‘प्रिंस’ उनकी निर्देशन की पाठशाला रही है और इस बार उनके सहपाठी हैं, अब्बास दलाल और हुसैन दलाल। दोनों दलाल बंधु कितने मूडी लेखक हो सकते हैं, ये फिल्म ‘ब्लैकआउट’ देखकर समझा जा सकता है। वह लिखने बैठें तो ‘बंबई मेरी जान’ भी लिख सकते हैं और सिर्फ नाम के लिए लिखना हो तो उनका ‘ब्लैकआउट’ भी हो सकता है। फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसकी कहानी, पटकथा और संवाद ही हैं। दूसरे नंबर पर है इसका सुस्त सा निर्देशन। पता ही नहीं चलता कि फिल्म कहां से चली है और कहां को जा रही है।
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ऊंचे सितारों की फीकी निकली दुकान
कहने को फिल्म ‘ब्लैकआउट’ में सितारों की इतनी लंबी फौज है कि एक बार तो इसे मल्टीस्टारर फिल्म मानने का मन भी कर आता है। लेकिन जैसे सुनील ग्रोवर ने ठीक ठाक फिल्म को शुरू के आधे घंटे में पंक्चर किया है, वैसा काम इसमें आगे आने वाले सितारे भी लगातार करते रहते हैं। अनंत विजय जोशी और छाया कदम जैसे कलाकारों के होते हुए भी फिल्म को आखिर तक देखना किसी मैराथन को पूरा करने से कम नहीं है। फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ के बाद संगीतकार विशाल मिश्रा ने यहां एक बार फिर पूरी तरह निराश किया है। मनोहर वर्मा के रचे एक्शन सीन्स जरा सा भी उत्साह नहीं जगाते हैं और जॉन स्टुअर्ट इडुरी जैसे हुनरमंद के होने के बावजूद फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी के सुर से कहीं संगत नहीं बिठा पाता है। बहुत फालतू टाइम हो तभी ये फिल्म देखना शुरू करें, नहीं तो ये फिल्म आपका वीकएंड खराब करने में कसर कोई नहीं छोड़ती है।