फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Film Review: अपने दृश्य और संवादों से चौंका देगी 'बेगम जान'

Fri, 14 Apr 2017 11:00 AM IST
रवि बुले
विज्ञापन
बेगम जान - फोटो : SELF
विज्ञापन
निर्माताः विशेष भट्ट
विज्ञापन


निर्देशकः श्रीजीत मुखर्जी

सितारेः विद्या बालन, गौहर खान, पल्लवी शारदा, आशीष विद्यार्थी, रजित कपूर, नसीरूद्दीन शाह

रेटिंग ***
 
रवि बुले

बेगम जान राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी की बांग्ला फिल्म राजकहिनी का हिंदी रीमेक है। यह आजादी के दौर की ऐसी कहानी है जो आपने पहले नहीं सुनी होगी। कामातुर नायक-नायिकाओं की फिल्में बनाते हुए बीते कुछ वर्षों में लगातार फ्लॉप होने वाले भट्ट कैंप के लिए भी यह फिल्म सफलता की नई राहें खोलने वाली उम्मीद है।

फिल्म अपने कथानक की ताजगी के साथ विद्या बालन के परफॉरमेंस के लिए देखी जा सकती है। लगभग दर्जन भर महत्वपूर्ण किरदारों के बीच विद्या अपनी मौजूदगी को श्रेष्ठतम ढंग से दर्ज कराती हैं।
विज्ञापन


वह अपने इरादों की पक्की और कुछ हद तक ऐसी बिंदास जिद्दी महिला के किरदार में हैं, जो वेश्यावृत्ति के अड्डे एक कोठे की मालकिन है।

ये भी पढ़ें - क्यों उस लड़की को मारने पर बार-बार रोने लगतीं थीं विद्या, अब हुआ खुलासा
 

पढें: कैसी है विद्या बालन की फिल्म 'बेगम जान'

'बेगम जान' के एक सीन में विद्या बालन
बेगम जान 1947 में देश विभाजन के कई मार्मिक पल हमारे सामने लाती है। इन्हीं में एक भारत-पाकिस्तान को बांटने वाली रेडक्लिफ रेखा के खींचे जाने का मामला है। फिल्म बताती है कि यह रेडक्लिफ रेखा बेगम जान के कोठे के बीच से गुजरती है। यही नहीं, श्रीमान रेडक्लिफ ने कोठे की जगह पर एक सैनिक चौकी बनाने की योजना भी नक्शे में दर्ज कर रखी है।

अब भारत-पाकिस्तान के अधिकारियों की कोशिश है कि किसी तरह बेगम जान से उसकी यह चारदीवारी छीन ली जाए। परंतु बेगम जान और उसके लिए काम करने वाली लड़कियों को यह मंजूर नहीं।

यह कोठा ही उनका घर है, देश है, देह है। यहां इन्हीं का कानून चलता है। सवाल यह कि क्या अधिकारी बेगम जान से कोठा खाली करा सकेंगे?

बेगम जान के वे दृश्य और संवाद चौंकाते हैं जो नग्न सचाइयों को छुपाने वाले परदों को तार-तार कर देते हैं। इनमें स्त्री पुरुष संबंध, धर्म-जाति की ऊंच-नीच, लोगों को हिंदू-मुसलमान बता कर फैलाई जाने वाली नफरत जैसे विषय शामिल हैं।

बेगम जान बातों की रौ में बहती हुई कई बार क्रूर ढंग से इनका पोस्टमार्टम करती हैं। निस्संदेह विद्या बालन पूरी तरह अपने किरदार में डूबी हुई हैं। खास तौर पर दूसरे हिस्से में वह छा जाती हैं।


ये भी पढ़ें - VIDEO: 'बेगम जान' का पहला गाना रिलीज, दिल छू लेगी आशा भोसले की आवाज
विज्ञापन

फिल्म के बाकी किरदारों पर भारी पड़ती है 'बेगम जान'

'बेगम जान' के एक सीन में विद्या बालन
गौहर खान और पल्लवी शारदा के हिस्से भी कुछ अच्छे दृश्य हैं। आशीष विद्यार्थी, रजित कपूर और विवेक मुश्रान अपनी भूमिकाओं को साधे रहते हैं। चंकी पांडे अपने लुक से चौंकाते हैं।
श्रीजीत मुखर्जी ने राजकहिनी की मूलकथा, उसके फिल्मांकन और संवादों के साथ ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की। परंतु एक बड़ा बदलाव किया। राजकहिनी दुनिया के प्रत्येक रिफ्यूजी को समर्पित फिल्म थी।

उसका दायरा वैश्विक था। जबकि हिंदी में कहानी को 2016 की दिल्ली में रेप की कोशिश की एक घटना से शुरू किया गया है। इससे न केवल फिल्म की टोन बदल गई बल्कि बांग्ला और हिंदी फिल्मों के संदेश में जमीन-आसमान का अंतर आ गया।

महेश भट्ट की स्त्री-पुरुष और हिंदू-मुस्लिम फिलॉसफी की छाप बेगम जान पर खूब है। इस तरह श्रीजीत पर हिंदी संस्करण में निर्माता का हस्तक्षेप दिखता है। इसके बावजूद हिंदी के दर्शकों के लिए बेगम जान एक अलग अनुभव साबित हो सकती है।
  ये भी पढ़ें - निर्देशक का नाड़ा बांधने पर मिली पहली फिल्म, जानें कैसे हीरो से विलेन तक पहुंचे चंकी पांडे
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें