फिल्म एंटरटेनमेंट है तो क्या इसके लिए दिमाग सिनेमाघर से बाहर रखना जरूरी है? कॉमेडी फिल्में दर्शकों से यही आग्रह करती हैं। अगर आप ऐसा नहीं कर सके तो ‘बजाते रहो’ देख कर लगेगा कि दिमाग का बैंड बज गया।
आपने थोड़ा भी सोचा तो समझिए कि आपकी बज गई! इन दिनों दिल्ली केंद्रित कॉमेडी फिल्में बनाई जा रही हैं, जिसमे पंजाबियत का तड़का है। ‘बजाते रहो’ में भी दिल्ली है, पंजाबितय है।
फिल्म शुरू होती है स्टिंग ऑपरेशन से। घरों में केबल कनेक्शन देने वाला हीरो तुषार (सुक्खी) एक स्कूल प्रिंसिपल को रिश्वत लेते हुए कैमरे में कैद करता है। पता चलता है कि सुक्खी, उसकी मम्मीजी (डॉली अहलूवालिया) और जीजा मिंटू (विनय पाठक) एक वसूली मिशन पर हैं। जिसमें मिंटू का तुनकमिजाज दोस्त (बलवंत) उनका साथ देता है।
आगे जाकर सुक्खी की गर्लफ्रेंड मनप्रीत (विशाखा सिंह) भी मिशन में शामिल हो जाती है। ये सब मिल कर एक रईस सभरवाल (रवि किशन) से 15 करोड़ रुपये वसूलने के चक्कर में हैं!
सभरवाल ने ऐसा क्या किया...? दरअसल यह विलेन सुक्खी के पिता की मौत जा जिम्मेदार है। इसने एक ‘फाइनेंशियल फ्रॉड’ का चक्कर चला कर सुक्खी के पिता को फंसा दिया था। जिससे उन्हें हार्ट अटैक आ गया और जान के साथ परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा भी चली गई। जान तो लौट नहीं सकती, मगर सुक्खी और मम्मीजी ने तय किया है कि कम से कम प्रतिष्ठा तो वापस लाएंगे।
निर्देशक ने इन दिनों बन रही ऑफ बीट कॉमेडी फिल्मों से प्रेरणा लेते हुए कुछ डिफरेंट करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे। फिल्म न ढंग से हंसा पाती है और न इमोशन ही पैदा कर पाती है। जबकि कलाकारों ने अपनी ओर से कसर बाकी नहीं रखी।
देखते-देखते सवाल पैदा होता है कि डायेक्टर आखिर क्या बजाना चाहता है...? कहानी के ढीले पुर्जों की आवाजें कान में बजती हैं। सभरवाल तूने बुरा काम किया तो इसका नतीजा बुरा होना ही था... कहानी इस संदेश के साथ खत्म होती है।
फिल्म में दिल्ली के रहन-सहन को करीने से पर्दे पर उतारा गया है। आइटम डांसनुमा दो गाने और माता का मसालेदार जगराता भी है, लेकिन यह काफी नहीं है। कुछ सेक्सी चुटकुलों के बावजूद फिल्म में कमी-सी है।
रवि किशन का काम सबसे बढिय़ा है, जबकि रणवीर शौरी भी चमक छोड़ते हैं। तुषार कपूर निर्देशक के ऐक्टर हैं। ऐसे में यहां उनके हिस्से प्रभावित करने वाले विशेष क्षण नहीं हैं। ‘बजाते रहो’ में ऐसा कुछ नहीं है कि जिसे आप न देखने पर ‘मिस’ करेंगे।