आमतौर पर कहा यही जाता है कि हिंदी सिनेमा में कहानियों की कमी है। टाइम्स समूह की फिल्म प्रोडक्शन कंपनी जंगली पिक्चर्स ने इस मामले में उदाहरण पेश करने की समय समय पर तारीफ लायक कोशिशें की हैं कि इसके प्रबंधन ने लीक से इतर फिल्मों को न सिर्फ सहारा दिया बल्कि एए फिल्म्स व जी स्टूडियोज जैसे दिग्गज वितरकों के जरिये इन्हें हिंदी सिनेमा के दर्शकों तक पहुंचाने की पूरी कोशिश भी की। लेकिन, 2022 में सिनेमा बदल रहा है। हिंदी सिनेमा को भी इस ट्रेन में बैठना ही होगा। नहीं तो ये पीछे छूट जाएगा। फिल्म ‘बधाई दो’ इसी फ्रेंचाइजी की पिछली फिल्म ‘बधाई हो’ की ही तरह सामाजिक और पारिवारिक ताने बाने में वर्जित विषय पर बनी फिल्म है। देखा जाए तो ये फॉर्मूला आयुष्मान खुराना का है कि एक वर्जित विषय को किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि में डालकर एक कहानी रच दी जाए। दिक्कत इस फॉर्मूले में अब ये आ रही है कि इसमें वर्जित विषय तो फिल्म दर फिल्म बदल जा रहे हैं लेकिन इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि तकरीबन एक जैसी हो चली है। आयुष्मान की पिछली फिल्म ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ इसी के चलते फ्लॉप हुई और अब ‘बधाई दो’ के सामने भी बॉक्स ऑफिस की तगड़ी चुनौती है।
फिल्म ‘बधाई दो’ दो ऐसे लोगों की कहानी है जिनके जीवन इंद्रधनुषी है, एलजीबीटीक्यू (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर) समुदाय की कहानियां सिनेमा में लाने के लिए खूब पैसा आ रहा है, कहां से आ रहा है, ये शोध का विषय है। ओटीटी वाले ऐसी फिल्मों के लिए इतना पैसा एक मुश्त दे रहे हैं कि फिल्म का बॉक्स ऑफिस पर चलना न चलना अब खास मायने भी नहीं रखता, बशर्ते फिल्म के नायक नायिका जाने पहचाने हों। ओनीर की सेना के एक समलैंगिक अफसर पर प्रस्तावित फिल्म को भारतीय सेना ने भले इजाजत न दी हो, लेकिन देश के अलग अलग राज्यों की पुलिस ने अभी ऐसा कोई फरमान जारी नहीं किया। सोचिए अगर पुलिस ठान ले कि उसको भ्रष्टाचार में लिप्त होने वाली फिल्में रिलीज नहीं होने दी जाएंगी और पुलिस किरदारों पर बनने वाली फिल्मों की स्क्रिप्ट भी पहले मंजूर करानी होगी, तो क्या होगा? तब फिल्म ‘बधाई दो’ शायद ही बन पाती और कहीं शिक्षक संघों ने भी ऐसा ही कुछ ठान लिया तो पता नहीं क्या होगा।