भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यस्था नेटफ्लिक्स को अपने पैर जमाने में बहुत मुश्किल हो रही है, ये इसके अमेरिका में बैठे आला अफसर भी मानने लगे हैं। यहां नेटफ्लिक्स के मुंबई दफ्तर में हर तिमाही कोई न कोई बड़ा विकेट गिरता रहता है। किसी को समझ नहीं आ रहा कि किस विभाग में क्या हो रहा है। पीआर एजेंसी भारतीय भाषाओं के समाचार माध्यमों को अंग्रेजी में मेल पर मेल भेजती रहती है। उनको पता है कि संवाद जब तक देसी भाषा में न हो, उत्पाद और उपभोक्ता का रिश्ता नही बनता लेकिन कोई किसी की यहां सुनने वाला दिखता नहीं। अपना खुद को ओटीटी ऐप सोनी लिव चलाने वाली कंपनी सोनी पिक्चर्स को भी पता है कि उन्होंने क्या बनाया है और तभी उसे फिल्म ‘लूप लपेटा’ को बजाय अपनी कंपनी के ओटीटी पर दिखाने के उसे नेटफ्लिक्स पर ‘डंप’ करना बेहतर लगता है। करण जौहर ये पहले ही खूब कर चुके हैं। अब बारी दूसरे फिल्म निर्माताओं की है। नेटफ्लिक्स है कि उसे समझ ही नहीं आ रहा। इसके मुंबई के अफसर इंडिया में रहते हैं और अपनी सोच की कहानियां दिखाना चाहते हैं भारत को। वह भी सबसे ज्यादा कीमत वसूल करके।
अस्पताल के छत पर खड़ी सावी को सत्या मिलता है। सावी उससे पहले अपने बाथरूम में नशा करते दिखती है। सावी है। सत्या है। तो दोनों को मिलना ही था। और, फिल्म बनानी है तो एक कहानी भी होनी ही चाहिए। लेकिन, हिंदी सिनेमा का ये गर्तकाल चल रहा है। इस दौर के निर्देशक कहानियों के लिए लेखकों के पास नहीं जाते। वे लेखकों को बुलाते हैं कहीं से उधार ली गई कहानी पर मेहनत करने। दुनिया भर के क्रिएटिव इनपुट आते हैं। सिर शेर का। पूंछ बिल्ली की। बदन तेंदुए का और आवाज किसी की भी हो सकती है। और, इतने सारे दिमाग मिलकर जब कोई फिल्म बनाते हैं तो ये फिल्म ‘लूप लपेटा’ ही हो सकती है। ये विचार कोई तीन दशक पुराना है। जर्मन फिल्म की रीमेक बनाते समय फिल्म ‘लूप लपेटा’ के मेकर्स ने न हिंदुस्तानी सोच के दायरे में खुद को बांधा है और न ही उनको ये पता है कि इस फिल्म का दर्शक कौन है?