अगर आपने हिमेश रेशमिया की कोई 11 साल पहले आई फिल्म ‘एक्सपोज’ देखी है तो आपको रवि कुमार भी याद होगा। अनंत महादेवन निर्देशित इस फिल्म में सोनाली राउत और जोया अफरोज की अदावत में मर्डर होता है और रवि कुमार तफ्तीश में शामिल होता है। रवि कुमार कोई साधारण पुलिस अफसर नहीं है, ये उसकी जुल्फों से आप समझ सकते हैं। दो घंटे 22 मिनट की फिल्म में पूरे तीन घंटे वह हर फ्रेम में मौजूद रहता है। मुझे पता था कि आप की गणितेन्द्रिय सक्रिय हो चुकी है कि दो घंटे 22 मिनट में तीन घंटे, लेकिन हिमेश रेशमिया ने यहां फिल्म शुरू करते ही बता दिया है, कृपया लॉजिक न लगाएं। सिर्फ पिक्चर देखें और दिमाग घर पर छोड़कर आएं। हफ्ते में एक बार इतना करना भी अब जरूरी हो चला है।
Himesh Reshammiya: अपनी नेटवर्थ का 26% लगाकर हिमेश ने बनाई 'बैडएस रवि कुमार', कहां से लाए इतनी मोटी रकम?
‘बैडआस रविकुमार’ में सनी देओल, सुनील शेट्टी, अक्षय कुमार और उनसे भी पहले के अनिल शर्मा वाली फिल्मों के धर्मेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा आदि सितारों का कॉकटेल हैं, हिमेश रेशमिया। उनके पास हर मर्ज का इलाज है। कहानी भी उन्हीं की है। गाने भी उन्हीं के हैं। मुसीबतें भी उनकी ही खड़ी की हुई हैं और इलाज भी उनका। अगर आपने मान लिया है कि इस फिल्म में आपका कुछ नहीं है। तो मजे लीजिए फिल्म के। तारीफ की बात ये भी है कि सवा दो घंटे करीब की ये फिल्म देखते हुए कोई बीच में फिल्म छोड़कर जाता नही दिखता, जैसे सब मन बनाकर ये सियापा देखने आए हैं। सियापा लिखना ही ठीक है, असल शब्द लिखने से दिक्कत हो सकती है।
पूरी फिल्म में एक्शन है, इमोशन है, सस्पेंस के नाम पर हिमेश रेशमिया हैं और ड्रामा का दूसरा नाम ही हिमेश। तुकबंदी वाले डायलॉग गुदगुदी करते हैं। स्पूफ वाली भी फीलिंग ये फिल्म देखते आती है और क्रिंज कॉमेडी वाली भी। हिंदी सिनेमा में इस श्रेणी के सिनेमा की मौजूदा दौर में बहुत जरूरत है। तमाम दिमाग लगाकर भी हिंदी सिनेमा के धुरंधर न रीमेक ढंग की बना पा रहे हैं और न ही ओरिजिनल तो जब कचरे में ही लोटना है तो फिर ‘बैडआस रविकुमार’ में तो हिमेश रेशमिया बताकर ऐसा करवा रहे हैं। करने को कुछ नहीं हो, सवा दो घंटे टाइम काटना हो, पैसे की ज्यादा मारामारी न हो तो इस हफ्ते ये फिल्म देख डालिए। दिमाग को कभी कभी रिलैक्स रखना भी जरूरी है।
हां, अगर आपको इस समीक्षा में फिल्म की कहानी, संवाद, निर्देशन, गीत-संगीत और बाकी तकनीके चीजें भी जाननी हैं तो समझ लीजिए कि कहानी एक ऐसे इंस्पेक्टर की है जो देश में तो क्या दुनिया में कहीं भी आ जा सकता है। झुमरीतलैया वाले जेम्स बॉन्ड जैसा है। कीर्ति कुलहरि ने ये फिल्म काहे की, वही जानें लेकिन पैसा तो सबको कमाना है। सनी लिओन ने तो पहले ही खूब कमा रखा है, अब वह फिल्में रिन जैसी चमकार पाने के लिए करती हैं। संजय मिश्रा अपने मस्त हैं। उनको भी पइसा चाहिए। रोल कुछ भी करवा लो। गाना-बजाना ठीक ठाक है। वैधानिक चेतावनी ये है कि एक गाना बहुत लंबा है और सू सू करने के लिए ब्रेक लेने का पिक्चर देखते समय बिल्कुल सही समय पर सही ब्रेक देता है।