फिल्म ‘अप्पू’ की कहानी वहां से शुरू होती है जहां शिकारियों का दल एक हाथी को लेकर ट्रक से भाग रहा है और एक नन्हा हाथी अप्पू उस ट्रक का पीछा करता दिखता है। उसके बूते के बाहर की बात है ट्रक को रोक माना। वह लड़खड़ाकर गिरता भी है। बेहोश होता है। आंखें खुलती हैं तो सामने ‘टाइगर’ है। टाइगर एक घरेलू कुत्ते का नाम है जो अपने मालिकों से बिछड़ गया है। बातूनी है लेकिन अप्पू का सहारा है। अप्पू अपनी रामकहानी सुनाता है और बताता है कि वहां वह पहुंचा कैसे।
कहानी में एक बच्ची भी आती है जो शिकारियों के चंगुल से निकल भागी है। ‘तितली’ को भी वह आजाद करा चुकी है। अप्पू को उस अड्डे का पता मिल जाता है जहां उसके ‘पापा’ को शिकारियों ने कैद कर रखा है। मुश्किल वक्त में उसे अपनी दादी याद आती है। दादी के सबक के सहारे वह मोर्चा लेता है। अपने पापा को आजाद कराता है और जंगल में अरसे से चली आ रही अदावत को भी दूर करता है, क्योंकि ‘तितली’ उसके साथ जो आ गई है।
बड़े परदे पर रिलीज होने वाली किसी एनीमेशन फिल्म जैसी फिल्म ‘अप्पू’ नहीं है। एक साधारण किरदार की एक सरल कहानी कहती ये फिल्म शायद ओटीटी के लिए ही बनी और इन दिनों ओटीटी की तरफ से सिनेमाघरों में अनिवार्य प्रदर्शन की लगाई गई शर्त के चलते ही सिनेमाघरों तक पहुंची। फिल्म पहले 2 फरवरी को रिलीज होने वाली थी। हफ्ता हफ्ता करके आगे खिसकती फिल्म अप्रैल में आकर परदे तक पहुंची है। स्कूली बच्चों खासकर नर्सरी और किंडरगार्टन के बच्चों को ये फिल्म सामूहिक रूप से दिखाई जा सकती है। साथ में उनके अभिभावक भी आ गए तो फिल्म का अच्छा बिजनेस मॉडल फिल्म बन सकता है।
प्रसनजीत, अजय वेलू और अर्चिष्मान कर ने एक बेसिक सी एनीमेशन फिल्म एक ऐसी कहानी पर बनाई है जैसी कहानियां बच्चे अक्षर ज्ञान के बाद किताबों में पढ़ते हैं। फिल्म को बनाने वालों में एक गेमिंग कंपनी भी शामिल है तो संभावना इस बात की भी है कि सिनेमाघरों तक अप्पू को पहुंचाने की अगली मंजिल इस किरदार पर बना बच्चों का कोई वीडियो गेम हो। औसत कहानी, औसत डबिंग और औसत एनीमेशन वाली फिल्म का संगीत भी औसत है। बच्चे इस फिल्म को देखकर खूब किलकारी मारकर हंसे, ऐसे मौके भी फिल्म में कम ही हैं लेकिन चूंकि फिल्म करीब 90 मिनट की है तो बच्चों के साथ वक्त बिताने के लिए बड़े भी इसे देख सकते हैं।